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SanatanDharma: हनुमान चालीसा में हनुमान जी को “अष्ट सिद्धि नव निधि के दाता” क्यों कहा गया?

SanatanDharma: हनुमान चालीसा में हनुमान जी को "अष्ट सिद्धि नव निधि के दाता" क्यों कहा गया?

हनुमान चालीसा में हनुमान जी को “अष्ट सिद्धि नव निधि के दाता” क्यों कहा गया?

भारत की धार्मिक परंपरा में हनुमान चालीसा का अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान है। तुलसीदास जी द्वारा रचित यह चालीसा न केवल भक्तिभाव से ओतप्रोत है, बल्कि इसमें हनुमान जी के अद्भुत गुणों, शक्तियों और सिद्धियों का भी वर्णन मिलता है।

इसी में एक प्रसिद्ध पंक्ति आती है –

“अष्ट सिद्धि नव निधि के दाता, अस बर दीन जानकी माता।”

यह पंक्ति साधारण नहीं है। इसके भीतर भक्तिभाव, शक्ति और समृद्धि तीनों का अद्भुत संगम छिपा है। आइए समझते हैं कि माता जानकी ने हनुमान जी को यह अद्वितीय वरदान क्यों दिया और इसका आध्यात्मिक महत्व क्या है।

अष्ट सिद्धियाँ — दिव्य शक्तियों का वरदान

सनातन धर्म में “सिद्धि” शब्द का अर्थ है — ऐसी दिव्य शक्ति जो किसी साधक को दीर्घ तप, भक्ति और साधना के फलस्वरूप प्राप्त होती है।
अष्ट सिद्धियाँ आठ दिव्य शक्तियाँ मानी गई हैं, जो किसी भी देव या सिद्ध पुरुष को असाधारण सामर्थ्य प्रदान करती हैं। ये हैं –

1. अणिमा: स्वयं को सूक्ष्मतम रूप में बदलने की शक्ति, जिससे अदृश्य भी हुआ जा सकता है।

2. महिमा: अत्यंत विशाल रूप धारण करने की क्षमता — जैसा हनुमान जी ने लंका में प्रवेश करते समय दिखाया।

3. लघिमा: शरीर को हल्का कर आकाश में गमन करने की सामर्थ्य।

4. गरिमा: शरीर को अत्यधिक भारी करने की शक्ति, जिससे कोई हिला न सके।

5. प्राप्ति: इच्छित वस्तु या व्यक्ति को तुरंत प्राप्त करने की योग्यता।

6. प्राकाम्य: मन की हर इच्छा को पूर्ण करने की क्षमता।

7. ईशित्व: अपने बल से सृष्टि के कार्यों को नियंत्रित करने की सामर्थ्य।

8. वशित्व: सबको अपने प्रेम, भक्ति या आदेश से वश में करने की शक्ति।

हनुमान जी इन सभी सिद्धियों के अधिपति माने जाते हैं। माता सीता के आशीर्वाद से उन्हें यह दिव्य वरदान मिला कि वे स्वयं तो इन सिद्धियों के स्वामी हैं ही, बल्कि अपने भक्तों को भी इनका आशीर्वाद दे सकते हैं।

नव निधियाँ – समृद्धि और सौभाग्य के प्रतीक

‘निधि’ का अर्थ होता है – खजाना या संपत्ति।
देवी लक्ष्मी की नौ दिव्य निधियाँ ‘नव निधि’ कहलाती हैं। ये केवल भौतिक धन का प्रतीक नहीं, बल्कि सुख, सौभाग्य और आध्यात्मिक संपन्नता का भी द्योतक हैं।

इनका नाम इस प्रकार है —

1. पद्म

2. महापद्म

3. शंख

4. मकर

5. कच्छप

6. मुखुंद

7. नंद

8. नील

9. खर्व

इन नौ निधियों में भौतिक धन, रत्न, ज्ञान, सौभाग्य, संतोष और आध्यात्मिक बल सबका समावेश है।
हनुमान जी को “नव निधियों के दाता” इसलिए कहा गया क्योंकि उनके पूजन से मनुष्य को न केवल धन-संपत्ति की प्राप्ति होती है, बल्कि जीवन में संतोष, बल और वैराग्य भी प्राप्त होता है।

माता जानकी का वरदान — भक्ति का अमूल्य आशीर्वाद

रामायण के सुंदरकांड में जब हनुमान जी अशोक वाटिका में पहुँचकर माता सीता को प्रभु श्रीराम का संदेश देते हैं, तो माता अत्यंत प्रसन्न होती हैं।
हनुमान जी की विनम्रता, समर्पण और भक्ति को देखकर माता सीता उन्हें आशीर्वाद देती हैं –

“तुम्हें अष्ट सिद्धियाँ और नव निधियाँ प्राप्त हों, और तुम अपने भक्तों को भी इनका वरदान देने में समर्थ रहो।”

यह केवल आशीर्वाद नहीं था, बल्कि भक्ति के माध्यम से शक्ति और समृद्धि के संयोग का दिव्य आदेश था। तभी से हनुमान जी को “अष्ट सिद्धि नव निधि के दाता” कहा जाने लगा।

हनुमान जी की कृपा — भक्तों के लिए वरदान

जो भक्त श्रद्धा से हनुमान चालीसा का पाठ करते हैं, उन्हें जीवन में आत्मविश्वास, मानसिक बल और आध्यात्मिक शांति की प्राप्ति होती है।
हनुमान जी अपने भक्तों के सभी संकट हर लेते हैं, भय को मिटा देते हैं और धर्मपथ पर अग्रसर करते हैं।

उनकी भक्ति से जहां सिद्धियाँ जाग्रत होती हैं, वहीं नव निधियों का प्रवाह भी जीवन में आता है।

शक्ति, भक्ति और समृद्धि का संगम

हनुमान जी का स्वरूप केवल बलवान देवता का नहीं, बल्कि ज्ञान, विनम्रता और निष्ठा का प्रतीक है।
इसलिए उन्हें “अष्ट सिद्धि नव निधि के दाता” कहा गया —
क्योंकि वे अपने भक्तों को शक्ति, बुद्धि, धन और धर्म चारों वरदान प्रदान करते हैं।

जो व्यक्ति सच्चे मन से हनुमान जी की आराधना करता है, उसे न केवल सांसारिक सफलता मिलती है बल्कि आध्यात्मिक मुक्ति का मार्ग भी प्रशस्त होता है।

नेशनल कैपिटल टाइम्स 

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