सीएसई रिपोर्ट बताती है — पराली जलाना मामूली भूमिका
दिल्ली-NCR की खराब वायु गुणवत्ता पर नई वैज्ञानिक रिपोर्ट ने एक महत्वपूर्ण मोड़ दिखाया है। रिपोर्ट के अनुसार इस सर्दी में दिल्ली में जहरीली हवाओं के दिन-प्रतिदिन बिगड़ने के पीछे मुख्य कारण प्रदेशों की पराली जलाने की बजाय शहर के अंदर के स्रोत—खासकर ट्रैफिक और स्थानीय औद्योगिक/घरेलू उत्सर्जन—ज़्यादा प्रभावी रहे। अध्ययन में कहा गया है कि पराली के धुएँ का योगदान कुल प्रदूषण में अपेक्षाकृत सीमित रहा और कई दिनों पर यह 5% से भी कम दर्ज किया गया।
विश्लेषण में प्रदूषक पैटर्न को ट्रैफिक के पीक-घंटों (सुबह-शाम) से जोड़ा गया है — PM2.5, NO₂ और CO के स्तर सुबह 7–10 बजे और शाम 6–9 बजे के दौरान उभरे, जो सीधे वाहन-आधारित उत्सर्जन से मेल खाते हैं। इसके अलावा निर्माण-धूल, नगरपालिका कचरा जलाना, छोटे-मोटे उद्योग और घरेलू इंधन (रसोई-ठण्ड में इंधन) जैसे स्त्रोतों ने भी लगातार स्थानीय वायुगुणवत्ता खराब की।
रिपोर्ट यह भी इंगित करती है कि मौसमीय परिस्थितियाँ—जैसे शांत वायुमंडल और तापमान इन्वर्जन—प्रदूषक को नीचे फँसा कर तीव्र धुंध बनाती हैं। नतीजा यह हुआ कि भले ही ग्रामीण क्षेत्रों में पराली जलाने की घटनाएँ घटें, दिल्ली में हर दिन होने वाले शिखर प्रदूषण की पुनरावृत्ति बनी रही।
विशेषज्ञ सुझाव दे रहे हैं कि समाधान बहु-आयामी होना चाहिए: शहरों में ड्राइविंग की संख्या कम करना, सार्वजनिक परिवहन बेहतर करना, वाहनों के उत्सर्जन मानक सख्त करना, निर्माण-धूल और कचरा प्रबंधन पर कड़ी निगरानी तथा स्वच्छ घरेलू ईंधन को बढ़ावा देना। नीति निर्माताओं के लिए यह संदेश स्पष्ट है — पराली रोकना जरूरी है, पर अकेले इससे राजधानी की रोज़मर्रा की जहरीली लहरों को रोका नहीं जा सकता। अब प्राथमिकता स्थानीय उत्सर्जन कम करने और ठोस शहरी योजनाओं को लागू करने की है।












