स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) को लेकर दायर याचिका पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई ने राजनीतिक और प्रशासनिक हलकों में हलचल बढ़ा दी है। इस मामले में अदालत पहले ही चुनाव आयोग (EC) से जवाब तलब कर चुकी है। याचिकाकर्ताओं का आरोप है कि SIR प्रक्रिया के जरिए बड़ी संख्या में मतदाताओं के नाम सूची से हटाए जा सकते हैं, जिससे चुनावी अधिकार प्रभावित होने की आशंका है।
सुनवाई के दौरान अदालत ने स्पष्ट किया कि मतदाता सूची से जुड़ा कोई भी कदम संवैधानिक दायरे में होना चाहिए और किसी भी नागरिक के मताधिकार को बिना ठोस कारण प्रभावित नहीं किया जा सकता। सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग से यह भी पूछा है कि SIR प्रक्रिया में पारदर्शिता कैसे सुनिश्चित की जाएगी और किन आधारों पर नाम जोड़े या हटाए जाएंगे।
इस बीच, चुनाव आयोग आज 5 राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों के ड्राफ्ट वोटर रोल जारी करने जा रहा है। आयोग के अनुसार, यह प्रक्रिया नियमित अभ्यास का हिस्सा है, जिसमें मतदाता सूची को अपडेट किया जाता है। ड्राफ्ट रोल जारी होने के बाद नागरिकों को दावे और आपत्तियां दर्ज कराने का अवसर दिया जाएगा, ताकि किसी भी तरह की त्रुटि को समय रहते सुधारा जा सके।
याचिकाकर्ताओं का कहना है कि SIR के तहत दस्तावेजों की सख्ती और प्रक्रियागत जटिलताएं खासकर गरीब, प्रवासी और कमजोर वर्गों के लिए परेशानी का कारण बन सकती हैं। उनका तर्क है कि अगर उचित safeguards नहीं रखे गए, तो लाखों मतदाता अपने संवैधानिक अधिकार से वंचित हो सकते हैं।
वहीं, चुनाव आयोग का पक्ष है कि मतदाता सूची की शुद्धता और पारदर्शिता लोकतंत्र की मजबूती के लिए जरूरी है। आयोग का कहना है कि SIR का उद्देश्य फर्जी और दोहरे नाम हटाना है, न कि योग्य मतदाताओं को बाहर करना।
अब सुप्रीम कोर्ट के अंतिम रुख पर सबकी नजरें टिकी हैं। अदालत का फैसला न केवल SIR प्रक्रिया की दिशा तय करेगा, बल्कि आगामी चुनावों से पहले मतदाता सूची संशोधन की संवैधानिक सीमाएं भी स्पष्ट कर सकता है।












