SIR प्रक्रिया पर सुनवाई के दौरान SC ने चुनाव आयोग को कड़ी टिप्पणियाँ दीं
पश्चिम बंगाल में चल रहे स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) को लेकर सुप्रीम कोर्ट में आज महत्वपूर्ण सुनवाई हुई। इस दौरान सर्वोच्च न्यायालय ने चुनाव आयोग ऑफ इंडिया (ECI) से पूछा कि जब किसी मतदाता को मतदाता सूची संशोधन (verification/hearing) के लिए बुलाया जा रहा है, तो उसे बूथ लेवल एजेंट (BLA) या प्रतिनिधि को साथ लेकर आने से क्यों रोका जा रहा है। अदालत ने इस मसले पर आयोग की स्पष्टीकरण माँगा और कहा कि प्रभावित व्यक्ति को स्वतंत्र रूप से अपना प्रतिनिधि साथ लाने का अधिकार होना चाहिए।
सुनवाई में कोर्ट ने यह भी कहा कि कोई मतदाता यह दावा न कर सके कि उसे पर्याप्त सुनवाई का मौका नहीं मिला। मुख्य न्यायाधीश ने स्पष्ट किया कि चाहे उम्मीदवार का प्रतिनिधि परिवार का सदस्य हो, दोस्त हो या चुनाव आयोग से जुड़े एजेंट — उसे सुनवाई में सम्मिलित होने की अनुमति मिलनी चाहिए।
बीच में वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल ने लंबित मामलों, सुनवाई केंद्रों की कमी तथा ‘लॉजिकल डिस्क्रेपेंसी’ के आधार पर बड़े पैमाने पर मतदाताओं के नाम हटाने पर चिंता जताई। कोर्ट ने इस पर सख्त टिप्पणी करते हुए कहा कि 1 करोड़ से अधिक मतदाता को नोटिस भेजे गए हैं और सुनवाई केंद्रों की संख्या पर्याप्त नहीं है।
TMC सांसद के आरोप:
तृणमूल कांग्रेस (TMC) के सांसद कल्याण बनर्जी ने कोर्ट में दावा किया कि ECI ने नियम बदलकर राजनीतिक दलों के BLAs को सुनवाई से दूर रखने की कोशिश की है। उन्होंने कहा कि बंगाल में कई इलाके तनावपूर्ण हैं और यह प्रक्रिया पारदर्शी नहीं है।
ECI की प्रतिक्रिया:
चुनाव आयोग ने सफ़ाई दी कि नाम हटाने का कोई अंतिम निर्णय नहीं लिया गया है और जहाँ केवल स्पेलिंग या मामूली विवरण में अंतर है, वहाँ नाम हटाए नहीं गए हैं। आयोग का कहना है कि यदि बुनियादी स्तर पर असामान्य अंतर मौजूद है तो नोटिस जारी किया गया है, न कि बिना वजह नाम निकालने का कोई निर्णय।
कोर्ट ने आगे ‘लॉजिकल डिस्क्रेपेंसी’ वाले मतदाताओं की सूची सार्वजनिक करने तथा पंचायत कार्यालयों में चस्पा करने के निर्देश भी दिए ताकि लोग समय पर दस्तावेज तैयार कर सकें और सही तरीके से सुनवाई में हिस्सा ले सकें।
सुनवाई अभी जारी है, और अदालत यह सुनिश्चित करना चाहती है कि SIR प्रक्रिया संविधान और निष्पक्षता के सिद्धांतों के अनुरूप पूरी हो।












