नई दिल्ली: पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव और संभावित ऊर्जा संकट के बीच प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की देशवासियों से की गई अपील ने राजनीतिक गलियारों में तीखी बहस छेड़ दी है। प्रधानमंत्री ने पेट्रोल-डीजल की खपत कम करने, एक साल तक सोने के गहनों की खरीद टालने और वर्क-फ्रॉम-होम व ऑनलाइन मीटिंग्स को बढ़ावा देने जैसे सुझाव दिए हैं। सरकार का कहना है कि यह कदम देश को वैश्विक आर्थिक अनिश्चितताओं से बचाने के लिए उठाया गया है।
प्रधानमंत्री की यह अपील ऐसे समय आई है जब अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव देखा जा रहा है। भारत अपनी जरूरत का करीब 85 प्रतिशत कच्चा तेल आयात करता है, ऐसे में कीमतों में वृद्धि का सीधा असर महंगाई, परिवहन और रोजमर्रा की वस्तुओं पर पड़ सकता है। विशेषज्ञ मानते हैं कि ईंधन की खपत कम करना और आयात पर निर्भरता घटाना आर्थिक स्थिरता के लिए जरूरी कदम हो सकता है।
हालांकि, विपक्ष ने इस अपील को लेकर सरकार पर निशाना साधा है। लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने इसे सरकार की विफलता की स्वीकारोक्ति बताया है। उनका कहना है कि जनता को यह बताना कि क्या खरीदें और कैसे खर्च करें, आर्थिक प्रबंधन की कमजोरी को दर्शाता है। वहीं, आम आदमी पार्टी के प्रमुख अरविंद केजरीवाल ने सवाल उठाया कि क्या यह किसी आर्थिक आपातकाल का संकेत है।
दूसरी ओर, भारतीय जनता पार्टी ने विपक्ष के आरोपों का जवाब देते हुए इतिहास का हवाला दिया है। पार्टी नेताओं का कहना है कि संकट के समय देश के नेताओं ने हमेशा जनता से सहयोग की अपील की है और इसे राजनीतिक चश्मे से नहीं देखना चाहिए।
दरअसल, भारतीय इतिहास में ऐसे कई उदाहरण मिलते हैं जब सरकारों ने आर्थिक या युद्धकालीन परिस्थितियों में नागरिकों से संयम बरतने को कहा। 1962 के भारत-चीन युद्ध के दौरान तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने लोगों से सोना दान करने और खरीद कम करने की अपील की थी। इसी तरह 1965 के भारत-पाकिस्तान युद्ध के बाद प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री ने खाद्य संकट से निपटने के लिए सप्ताह में एक समय भोजन छोड़ने का आह्वान किया था।
बाद में इंदिरा गांधी के कार्यकाल में भी विदेशी मुद्रा भंडार बचाने के लिए सोने की खरीद को हतोत्साहित किया गया। वहीं, यूपीए सरकार के दौरान तत्कालीन वित्त मंत्री पी. चिदंबरम ने 2013 में बढ़ते चालू खाता घाटे को नियंत्रित करने के लिए सोना खरीदने से बचने की अपील की थी।
विशेषज्ञों का मानना है कि मौजूदा वैश्विक परिस्थितियों को देखते हुए सरकार की अपील एहतियाती कदम हो सकती है, लेकिन इसका प्रभाव इस बात पर निर्भर करेगा कि आम जनता इसे किस तरह स्वीकार करती है। फिलहाल, यह मुद्दा राजनीतिक बहस का केंद्र बन चुका है और आने वाले समय में इसके आर्थिक व राजनीतिक असर पर सभी की नजरें टिकी रहेंगी।











