नई दिल्ली, बुधवार: तमिलनाडु की राजनीति में अहम घटनाक्रम के तहत सुप्रीम कोर्ट ने टीवीके (TVK) विधायक आर श्रीनिवास सेतुपति को बड़ी राहत देते हुए उनके फ्लोर टेस्ट में शामिल होने पर लगी रोक हटा दी है। शीर्ष अदालत ने मद्रास हाई कोर्ट के उस अंतरिम आदेश पर फिलहाल रोक लगा दी, जिसमें विधायक को विधानसभा में किसी भी प्रकार के विश्वास मत या शक्ति परीक्षण में भाग लेने से प्रतिबंधित किया गया था।
यह फैसला जस्टिस विक्रम नाथ, संदीप मेहता और विजय बिश्नोई की पीठ ने सुनाया। सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने हाई कोर्ट के आदेश पर हैरानी जताते हुए कहा कि चुनाव से जुड़े मामलों में इस तरह की याचिकाओं पर सीधे हस्तक्षेप करना असामान्य है। अदालत ने मामले की आगे की कार्यवाही पर भी फिलहाल रोक लगा दी है।
सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में डीएमके नेता केआर पेरियाकरुप्पन और अन्य पक्षकारों को दो सप्ताह के भीतर जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया है। गौरतलब है कि पेरियाकरुप्पन ने ही हाई कोर्ट में याचिका दाखिल कर सेतुपति के चुनाव और उनकी विधानसभा गतिविधियों पर सवाल उठाए थे।
मामले की पृष्ठभूमि बेहद दिलचस्प है। शिवगंगा जिले की तिरुपत्तूर सीट से चुनाव लड़ने वाले आर श्रीनिवास सेतुपति ने डीएमके उम्मीदवार पेरियाकरुप्पन को महज एक वोट के अंतर से हराया था। चुनाव आयोग के आंकड़ों के अनुसार, सेतुपति को 83,365 वोट मिले, जबकि उनके प्रतिद्वंद्वी को 83,364 वोट प्राप्त हुए।
चुनाव परिणाम के बाद पेरियाकरुप्पन ने मतगणना प्रक्रिया में गड़बड़ी का आरोप लगाया। उनका कहना था कि एक पोस्टल बैलेट को गलत तरीके से दूसरी विधानसभा सीट पर भेज दिया गया, जहां उसे वापस भेजने के बजाय निरस्त कर दिया गया। इसके अलावा, ईवीएम वोटों में भी कथित तौर पर अंतर होने की बात सामने आई थी।
इन्हीं आधारों पर मद्रास हाई कोर्ट की वेकेशन बेंच ने अंतरिम आदेश जारी करते हुए सेतुपति को विधानसभा में किसी भी प्रकार की वोटिंग प्रक्रिया से दूर रहने का निर्देश दिया था। कोर्ट ने इसे एक “असामान्य संवैधानिक स्थिति” बताते हुए कहा था कि जब जीत का अंतर इतना कम हो, तो हर वोट की अहमियत और बढ़ जाती है।
हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने इस दृष्टिकोण पर सवाल उठाते हुए संकेत दिया कि चुनावी विवादों के समाधान के लिए निर्धारित कानूनी प्रक्रिया का पालन किया जाना चाहिए। इस बीच, सी जोसेफ विजय के नेतृत्व वाली टीवीके सरकार ने विधानसभा में बहुमत साबित कर दिया है, जिससे फिलहाल सरकार को स्थिरता मिली है।
अब इस मामले की अगली सुनवाई सुप्रीम कोर्ट में होगी, जहां सभी पक्षों के जवाब के बाद अंतिम निर्णय लिया जाएगा। यह मामला न केवल तमिलनाडु की राजनीति बल्कि चुनावी प्रक्रिया और न्यायिक हस्तक्षेप की सीमाओं को लेकर भी एक महत्वपूर्ण मिसाल बन सकता है।











