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इंसाफ की आस फिर टूटी, दंगा पीड़ितों की पीड़ा आई सामने

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साल 1984 के सिख विरोधी दंगों से जुड़े एक मामले में कांग्रेस नेता सज्जन कुमार के बरी होने के बाद दंगा पीड़ितों का दर्द एक बार फिर सामने आ गया है। फैसले के बाद पीड़ित परिवारों ने गहरी नाराजगी और मायूसी जाहिर करते हुए कहा कि चार दशक बीत जाने के बावजूद उन्हें आज भी इंसाफ का इंतजार है।

दंगों में अपने परिजनों को खो चुके लोगों का कहना है कि उन्होंने अपनी आंखों के सामने अपनों को जिंदा जलते देखा था। उस दौर की भयावह यादें आज भी उनके जहन में ताजा हैं। एक पीड़ित ने कहा कि सड़कों पर लाशें बिछी थीं, हर तरफ आग और चीख-पुकार का माहौल था, लेकिन आज भी उन जख्मों पर मरहम नहीं लग पाया।

पीड़ितों का आरोप है कि इतने सालों तक चले मुकदमों और गवाहियों के बावजूद दोषियों को सजा नहीं मिलना न्याय व्यवस्था पर सवाल खड़े करता है। उनका कहना है कि वे सिर्फ सजा नहीं, बल्कि यह स्वीकारोक्ति चाहते हैं कि उनके साथ जो हुआ वह एक संगठित हिंसा थी, न कि सामान्य दंगा।

दंगा पीड़ित परिवारों ने यह भी कहा कि उन्होंने अपने जीवन का बड़ा हिस्सा अदालतों के चक्कर काटते हुए गुजार दिया। कई गवाह अब इस दुनिया में नहीं रहे और कई पीड़ित बूढ़े हो चुके हैं। ऐसे में इस तरह के फैसले उनके लिए एक और मानसिक आघात हैं।

पीड़ित संगठनों का कहना है कि वे इस फैसले के खिलाफ आगे की कानूनी लड़ाई जारी रखेंगे। उनका दावा है कि जब तक अंतिम सांस है, तब तक न्याय की मांग करते रहेंगे। उनका मानना है कि अगर इतने बड़े मामले में भी दोषियों को सजा नहीं मिलती, तो यह भविष्य में पीड़ितों के भरोसे को कमजोर करता है।

इस फैसले के बाद एक बार फिर 1984 के दंगों की त्रासदी और उससे जुड़े अनसुलझे सवाल राष्ट्रीय बहस का हिस्सा बन गए हैं। पीड़ितों की एक ही मांग है—उन्हें इंसाफ चाहिए, चाहे उसमें कितना ही समय क्यों न लग जाए।

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