काल भैरव जयंती : जब भगवान शिव ने लिया अपना रौद्र रूप, जानिए पूजा विधि और महत्व
नई दिल्ली। हिंदू धर्म में मार्गशीर्ष (अगहन) मास की कृष्ण अष्टमी तिथि को मनाई जाने वाली काल भैरव जयंती का विशेष महत्व है। इस दिन भगवान शिव के रौद्र स्वरूप “काल भैरव” की पूजा की जाती है। यह पर्व भय, नकारात्मकता और मृत्यु के भय को समाप्त करने वाला माना जाता है।
काल भैरव जयंती क्या है
मान्यता है कि इसी दिन भगवान शिव ने ब्रह्मा जी के अहंकार को समाप्त करने के लिए अपना रौद्र रूप धारण किया था, जिसे काल भैरव के नाम से जाना गया। इसलिए यह दिन शिवभक्तों के लिए अत्यंत पावन माना जाता है। इसे कालाष्टमी भी कहा जाता है।
काल भैरव की विशेषताएं
काशी के कोतवाल: काल भैरव को वाराणसी (काशी) का कोतवाल कहा जाता है। मान्यता है कि उनकी अनुमति के बिना कोई व्यक्ति काशी में टिक नहीं सकता।
वाहन – कुत्ता: कुत्ता उनका वाहन है, जो वफादारी, निडरता और सुरक्षा का प्रतीक माना जाता है।
समय और तंत्र के अधिपति: काल भैरव को ‘काल’ यानी समय के स्वामी कहा गया है। वे मृत्यु, तंत्र विद्या और गूढ़ साधनाओं के अधिपति हैं।
ग्रह दोष से मुक्ति: भैरव आराधना से शनि, राहु और केतु जैसे ग्रहों के दुष्प्रभाव दूर होते हैं।
काल भैरव जयंती क्यों मनाई जाती है
पौराणिक कथाओं के अनुसार, एक बार ब्रह्मा जी के अहंकार से क्रोधित होकर भगवान शिव ने अपने तीसरे नेत्र से काल भैरव का प्राकट्य किया था। काल भैरव ने ब्रह्मा जी का अहंकार नष्ट किया और संसार को यह सिखाया कि अहंकार का अंत विनाश ही है।
यह जयंती इसलिए मनाई जाती है ताकि मनुष्य अपने भीतर के भय, पाप और अहंकार को त्यागकर शिवत्व को धारण कर सके।
पूजा विधि और मान्यता
प्रातः स्नान कर भैरव मंदिर में दीप, धूप और प्रसाद अर्पित किया जाता है।
काले वस्त्र, तेल, उड़द और मदिरा चढ़ाने की परंपरा है।
भक्त कुत्तों को भोजन कराते हैं, क्योंकि वे काल भैरव के प्रिय माने जाते हैं।
रात में भैरव चालीसा और ‘ॐ कालभैरवाय नमः’ मंत्र का जाप किया जाता है।
कहा जाता है कि जो भक्त इस दिन उपवास रखता है और भैरव की आराधना करता है, उसे रोग, भय और मृत्यु से मुक्ति मिलती है।
काल भैरव जयंती का संदेश
यह पर्व हमें याद दिलाता है कि समय (काल) ही सबसे बड़ा सत्य है। जो समय का सम्मान करता है, वह जीवन में भयमुक्त और सफल रहता है। काल भैरव की आराधना से साहस, निर्भयता और आत्मबल की प्राप्ति होती है।
काल भैरव जयंती न केवल एक धार्मिक उत्सव है, बल्कि यह जीवन में अनुशासन, समय की मर्यादा और निडरता का प्रतीक भी है। भगवान शिव के इस रूप की आराधना से व्यक्ति को नकारात्मक ऊर्जा से मुक्ति और जीवन में सकारात्मकता की प्राप्ति होती है।












