दक्षिण एशिया के संघर्षों में अलग राह पर था ईरान, भारत से संबंधों की अलग कहानी
ईरान और भारत के रिश्ते आज भले ही भू-राजनीतिक संतुलन के हिसाब से देखे जाते हों, लेकिन इस्लामिक क्रांति से पहले दोनों देशों के संबंधों का स्वरूप काफी अलग था। उस दौर में ईरान की विदेश नीति पश्चिमी देशों के प्रभाव में थी और क्षेत्रीय राजनीति में उसके फैसले भी उसी दिशा में नजर आते थे। यही कारण था कि दक्षिण एशिया में हुए युद्धों और टकरावों के समय ईरान का रुख कई बार भारत की अपेक्षाओं से अलग दिखाई दिया।
1960 और 1970 के दशक में ईरान शाह के शासन में था। उस समय तेहरान की प्राथमिकताएं सामरिक और आर्थिक हितों पर केंद्रित थीं। पाकिस्तान के साथ उसके रिश्ते अपेक्षाकृत मजबूत थे, जबकि भारत के साथ संबंध सांस्कृतिक और ऐतिहासिक स्तर पर अच्छे होने के बावजूद रणनीतिक रूप से उतने गहरे नहीं थे। कुछ युद्धों और क्षेत्रीय तनावों के दौरान ईरान ने पाकिस्तान का समर्थन किया, जिसे भारत में अलग नजरिए से देखा गया।
इसके बावजूद, भारत और ईरान के बीच सभ्यता, संस्कृति और व्यापार के पुराने रिश्ते बने रहे। फारसी भाषा और भारतीय उपमहाद्वीप का ऐतिहासिक जुड़ाव दोनों देशों को करीब लाता रहा। शिक्षा, साहित्य और कला के क्षेत्र में भी आपसी संपर्क बना रहा, हालांकि राजनीतिक स्तर पर रिश्तों में वह गर्मजोशी नहीं दिखी, जो बाद के वर्षों में देखने को मिली।
1979 की इस्लामिक क्रांति ने ईरान की विदेश नीति की दिशा बदल दी। पश्चिम समर्थक नीति से हटकर ईरान ने स्वतंत्र और आत्मनिर्भर रुख अपनाया। इसी बदलाव के बाद भारत और ईरान के संबंधों में नया अध्याय शुरू हुआ। दोनों देशों ने ऊर्जा, व्यापार और क्षेत्रीय स्थिरता जैसे मुद्दों पर सहयोग बढ़ाया।
इतिहासकारों का मानना है कि क्रांति से पहले और बाद के दौर की तुलना करने पर साफ दिखाई देता है कि राजनीतिक व्यवस्था में बदलाव ने अंतरराष्ट्रीय रिश्तों को कैसे प्रभावित किया। आज भारत और ईरान के संबंध उस पुराने दौर से काफी अलग हैं, लेकिन इतिहास के ये पन्ने दोनों देशों की कूटनीति को समझने में अहम भूमिका निभाते हैं।












