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भोजशाला पर ऐतिहासिक फैसला: एएसआई ने हटाया ‘कमाल मौला मस्जिद’ का उल्लेख, अब 365 दिन होगी पूजा

मध्य प्रदेश के धार स्थित ऐतिहासिक भोजशाला परिसर को लेकर एक बड़ा प्रशासनिक और धार्मिक फैसला सामने आया है। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) ने हाई कोर्ट के हालिया निर्णय के बाद नया आदेश जारी करते हुए पहली बार इस स्थल को केवल “राजा भोज द्वारा स्थापित भोजशाला एवं संस्कृत पाठशाला” के रूप में संबोधित किया है। आदेश में पहले इस्तेमाल होने वाला “कमाल मौला मस्जिद” शब्द पूरी तरह हटा दिया गया है।

शनिवार शाम जारी इस आदेश को हिंदू पक्ष बड़ी जीत के रूप में देख रहा है। एएसआई ने स्पष्ट किया है कि हिंदू समुदाय को भोजशाला परिसर में पूजा-अर्चना, अध्ययन और धार्मिक गतिविधियों के लिए निर्बाध प्रवेश दिया जाएगा। इसके साथ ही अब साल के सभी 365 दिनों तक पूजा करने का रास्ता खुल गया है।

हालांकि एएसआई ने यह भी स्पष्ट किया है कि भोजशाला एक संरक्षित स्मारक बनी रहेगी और इसका संचालन प्राचीन स्मारक एवं पुरातात्विक स्थल एवं अवशेष अधिनियम (एएमएएसआर एक्ट 1958) के तहत ही किया जाएगा। यानी धार्मिक गतिविधियों के साथ-साथ स्मारक की सुरक्षा और संरक्षण की जिम्मेदारी भी जारी रहेगी।

16 मई 2026 को जारी आदेश में एएसआई ने मध्य प्रदेश हाई कोर्ट के फैसले का हवाला देते हुए कहा कि भोजशाला ऐतिहासिक रूप से संस्कृत शिक्षा, शोध और विद्या का प्रमुख केंद्र रही है। आदेश में इसे देवी वाग्देवी यानी मां सरस्वती को समर्पित मंदिर बताया गया है। इस बदलाव को लेकर राजनीतिक और धार्मिक हलकों में भी व्यापक चर्चा शुरू हो गई है।

इधर, धार की सांसद और केंद्रीय राज्यमंत्री सावित्री ठाकुर ने दावा किया है कि ब्रिटिश संग्रहालय पहले ही वाग्देवी की प्राचीन प्रतिमा लौटाने पर सहमत हो चुका था। उन्होंने बताया कि वर्ष 2017-18 में ब्रिटिश म्यूजियम ने इस प्रतिमा को भारत लौटाने की इच्छा जताई थी, लेकिन एक शर्त के कारण मामला आगे नहीं बढ़ पाया।

सावित्री ठाकुर के अनुसार, पूर्व राज्यसभा सांसद सुब्रमण्यम स्वामी ने केंद्र सरकार की ओर से ब्रिटिश म्यूजियम प्रबंधन के साथ कई दौर की बातचीत की थी। उन्होंने वर्ष 2014 से 2017 के बीच भोजशाला का चार बार दौरा भी किया था।

ब्रिटिश म्यूजियम की शर्त थी कि वाग्देवी की प्रतिमा को उसी मूल स्थान पर पुनर्स्थापित किया जाए, जहां वह पहले स्थापित थी। उस समय भोजशाला विवाद हाई कोर्ट में लंबित था, इसलिए यह प्रक्रिया पूरी नहीं हो सकी। अब हाई कोर्ट के ताजा फैसले और एएसआई के नए आदेश के बाद प्रतिमा की वापसी और पुनर्स्थापना की संभावना मजबूत मानी जा रही है।

भोजशाला को लेकर आया यह फैसला धार्मिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक दृष्टि से बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है। आने वाले दिनों में इस मुद्दे पर राष्ट्रीय स्तर पर और अधिक बहस और गतिविधियां देखने को मिल सकती हैं।

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