नई दिल्ली, भारत

भारत अपनी सीमा सुरक्षा को और मजबूत बनाने की दिशा में एक बड़ा कदम उठा रहा है। रक्षा मंत्रालय ने स्वदेशी स्ट्रैटोस्फेरिक एयरशिप प्रोग्राम की शुरुआत की है, जिसका उद्देश्य सीमावर्ती क्षेत्रों में चौबीसों घंटे निगरानी रखना और दुश्मन की गतिविधियों पर वास्तविक समय में नजर बनाए रखना है। इस महत्वाकांक्षी परियोजना को इसी वर्ष फरवरी में रक्षा मंत्री की अध्यक्षता वाली डिफेंस एक्विजिशन काउंसिल (DAC) से मंजूरी मिल चुकी है।
यह एयरशिप सामान्य ड्रोन या विमान की तुलना में कहीं अधिक ऊंचाई पर काम करेगा। इसे लगभग 20 किलोमीटर (करीब 66,000 फीट) की ऊंचाई पर लंबे समय तक उड़ान भरने के लिए विकसित किया जाएगा। इतनी ऊंचाई से यह सीमावर्ती क्षेत्रों में होने वाली गतिविधियों पर लगातार नजर रख सकेगा और सेना को रियल-टाइम खुफिया जानकारी उपलब्ध कराएगा। रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि यह तकनीक भारत की निगरानी क्षमता में बड़ा बदलाव ला सकती है।
स्ट्रैटोस्फेरिक एयरशिप को हल्के गैस-आधारित प्लेटफॉर्म के रूप में तैयार किया जाएगा, जो लंबे समय तक हवा में स्थिर रह सकता है। इसमें अत्याधुनिक इंटेलिजेंस, सर्विलांस एंड रिकॉनिसेंस (ISR) सेंसर लगाए जाएंगे। ये सेंसर उच्च गुणवत्ता वाली तस्वीरें, वीडियो, रडार डेटा और अन्य महत्वपूर्ण सूचनाएं जुटाकर सैन्य कमांड सेंटर तक पहुंचाएंगे। इसके अलावा यह प्लेटफॉर्म सीमावर्ती इलाकों में संचार नेटवर्क को मजबूत करने और आपातकालीन परिस्थितियों में संचार सहायता उपलब्ध कराने में भी उपयोगी साबित होगा।
रक्षा विशेषज्ञों के अनुसार, इतनी अधिक ऊंचाई पर मौजूद होने के कारण यह एयरशिप दुश्मन की सीमा के भीतर काफी गहराई तक गतिविधियों पर नजर रखने में सक्षम होगा। हालांकि इसकी निगरानी क्षमता का वास्तविक दायरा इसमें लगाए जाने वाले सेंसर, कैमरों और रडार प्रणाली पर निर्भर करेगा। इसका उद्देश्य सीमा पार जाकर किसी प्रकार की कार्रवाई करना नहीं, बल्कि भारतीय क्षेत्र से ही निगरानी और खुफिया जानकारी एकत्र करना है।
यह परियोजना ऐसे समय शुरू की गई है जब भारत अपनी उत्तरी और पश्चिमी सीमाओं पर आधुनिक निगरानी प्रणाली विकसित करने पर विशेष ध्यान दे रहा है। बदलती सुरक्षा चुनौतियों को देखते हुए सेना पारंपरिक निगरानी साधनों के साथ-साथ कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI), सैटेलाइट, लंबी दूरी के ड्रोन और हाई-एल्टीट्यूड प्लेटफॉर्म जैसी नई तकनीकों को भी तेजी से अपना रही है।
विशेषज्ञों का कहना है कि स्ट्रैटोस्फेरिक एयरशिप उपग्रहों और ड्रोन के बीच की तकनीकी कमी को काफी हद तक पूरा कर सकता है। जहां उपग्रह निश्चित समय पर किसी क्षेत्र के ऊपर से गुजरते हैं और ड्रोन की उड़ान अवधि सीमित होती है, वहीं यह एयरशिप कई दिनों या उससे भी अधिक समय तक लगातार एक ही क्षेत्र में रहकर निगरानी कर सकता है। इससे सेना को लगातार और भरोसेमंद खुफिया जानकारी मिलती रहेगी।
रक्षा मंत्रालय का मानना है कि स्वदेशी तकनीक पर आधारित यह कार्यक्रम भारत की आत्मनिर्भर रक्षा नीति को भी मजबूती देगा। यदि परियोजना तय समय के अनुसार सफल रहती है, तो भविष्य में इसका उपयोग केवल सीमा सुरक्षा तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि आपदा प्रबंधन, समुद्री निगरानी, संचार सहायता और रणनीतिक सैन्य अभियानों में भी किया जा सकेगा।
सुरक्षा मामलों के जानकारों का मानना है कि आधुनिक युद्ध में सूचना और निगरानी सबसे बड़ी ताकत बन चुकी है। ऐसे में 20 किलोमीटर की ऊंचाई से लगातार निगरानी करने में सक्षम यह स्वदेशी एयरशिप भारतीय सशस्त्र बलों की परिचालन क्षमता को नई मजबूती देगा और सीमा सुरक्षा व्यवस्था को अधिक प्रभावी बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।












