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लिफ्ट हादसे के 18 साल बाद मिला इंसाफ, सुप्रीम कोर्ट ने ₹3 करोड़ मुआवजे का दिया आदेश

नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने वर्ष 2003 में लिफ्ट हादसे में जान गंवाने वाले रिसर्च एंड एनालिसिस विंग (RAW) के अधिकारी विपिन हांडा के परिवार को ₹3.01 करोड़ से अधिक का मुआवजा देने के राष्ट्रीय उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग (NCDRC) के फैसले को बरकरार रखते हुए महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। शीर्ष अदालत ने कहा कि लिफ्ट का उपयोग करने वाले प्रत्येक व्यक्ति के लिए सुरक्षा कोई अतिरिक्त सुविधा नहीं, बल्कि एक मौलिक आश्वासन है। अदालत ने स्पष्ट किया कि लिफ्ट जैसी मशीनों के रखरखाव में किसी भी प्रकार की लापरवाही को स्वीकार नहीं किया जा सकता।

जस्टिस पी.एस. नरसिम्हा और आलोक अराधे की पीठ ने ओटिस एलिवेटर कंपनी (इंडिया) लिमिटेड द्वारा दायर अपील को खारिज कर दिया। अदालत ने कहा कि राष्ट्रीय उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग (NCDRC) के आदेश में हस्तक्षेप करने का कोई कारण नहीं है, क्योंकि उपलब्ध रिकॉर्ड से स्पष्ट है कि कंपनी की ओर से सेवा में कमी रही थी। सुप्रीम कोर्ट ने माना कि लिफ्ट के रखरखाव और उसकी सुरक्षित कार्यप्रणाली सुनिश्चित करने की प्राथमिक जिम्मेदारी कंपनी की थी।

अपने फैसले में शीर्ष अदालत ने कहा कि जो संस्था ऐसी मशीनों का संपूर्ण रखरखाव करती है, जिनकी खराबी सीधे लोगों के जीवन को खतरे में डाल सकती है, उसकी जिम्मेदारी सामान्य सेवा प्रदाता से कहीं अधिक होती है। अदालत ने कहा कि आधुनिक इमारतों में लिफ्ट एक अनिवार्य सुविधा बन चुकी है और लोग इस भरोसे के साथ उसका उपयोग करते हैं कि वह पूरी तरह सुरक्षित है। यदि रखरखाव में लापरवाही के कारण कोई दुर्घटना होती है, तो संबंधित कंपनी अपनी जिम्मेदारी से बच नहीं सकती।

यह मामला वर्ष 2003 का है, जब रॉ अधिकारी विपिन हांडा की एक लिफ्ट दुर्घटना में मौत हो गई थी। हादसे के बाद उनके परिवार ने न्याय और उचित मुआवजे के लिए लंबी कानूनी लड़ाई लड़ी। मामले की सुनवाई के दौरान राष्ट्रीय उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग ने ओटिस एलिवेटर कंपनी को सेवा में कमी का दोषी मानते हुए पीड़ित परिवार को ₹3.01 करोड़ से अधिक का मुआवजा देने का आदेश दिया था। कंपनी ने इस आदेश को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी, लेकिन शीर्ष अदालत ने उसकी दलीलों को खारिज कर दिया।

सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि उपभोक्ताओं की सुरक्षा से जुड़े मामलों में सेवा प्रदाताओं की जवाबदेही सर्वोच्च होनी चाहिए। किसी भी कंपनी का दायित्व केवल मशीन की स्थापना तक सीमित नहीं होता, बल्कि उसके नियमित निरीक्षण, समय पर मरम्मत और सुरक्षित संचालन को सुनिश्चित करना भी उसकी जिम्मेदारी है। यदि इस जिम्मेदारी में चूक होती है और उसके कारण किसी व्यक्ति की जान जाती है, तो कंपनी को उसके लिए उत्तरदायी ठहराया जाएगा।

अदालत की टिप्पणी को उपभोक्ता अधिकारों के लिहाज से भी अहम माना जा रहा है। कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि यह फैसला भविष्य में ऐसे मामलों में एक महत्वपूर्ण मिसाल बनेगा, जहां लिफ्ट, एस्केलेटर या अन्य सार्वजनिक उपयोग की मशीनों के रखरखाव में लापरवाही के कारण दुर्घटनाएं होती हैं। यह निर्णय कंपनियों को सुरक्षा मानकों का सख्ती से पालन करने के लिए भी प्रेरित करेगा।

विशेषज्ञों का मानना है कि सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला केवल एक परिवार को न्याय दिलाने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह सार्वजनिक सुरक्षा के प्रति कंपनियों की जवाबदेही भी तय करता है। इससे स्पष्ट संदेश गया है कि उपभोक्ताओं के जीवन और सुरक्षा के साथ किसी भी प्रकार की लापरवाही बर्दाश्त नहीं की जाएगी। अदालत ने दोहराया कि सुरक्षा से समझौता किसी भी कीमत पर स्वीकार नहीं किया जा सकता और सेवा प्रदाताओं को अपने दायित्वों का पूरी निष्ठा के साथ पालन करना होगा।

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