नई दिल्ली, दिल्ली
सुप्रीम कोर्ट ने एक अहम टिप्पणी में कहा है कि आपसी सहमति से बने रिश्ते के बाद शादी से इनकार करना अपने आप में आत्महत्या के लिए उकसाने का आधार नहीं बन सकता। अदालत ने स्पष्ट किया कि किसी रिश्ते के खत्म होने या शादी से इनकार किए जाने के बाद हुई आत्महत्या के मामले में केवल इस आधार पर दूसरे व्यक्ति को आत्महत्या के लिए उकसाने का आरोपी नहीं ठहराया जा सकता।
जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस के विनोद चंद्रन की पीठ ने मामले की सुनवाई करते हुए तेलंगाना के मेडचल-मलकाजगिरी जिले की अदालत में लंबित आपराधिक कार्यवाही को रद्द कर दिया। यह मामला एक महिला की आत्महत्या से जुड़ा था, जिसमें छह लोगों के खिलाफ आत्महत्या के लिए उकसाने के आरोप लगाए गए थे।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि रिकॉर्ड पर ऐसी कोई सामग्री या सबूत नहीं है, जिससे यह साबित हो कि आरोपियों ने महिला को आत्महत्या के लिए मजबूर किया या उसे इसके लिए उकसाया था। अदालत के अनुसार, केवल किसी रिश्ते का टूटना या शादी से इनकार किया जाना अपने आप में आत्महत्या के लिए उकसाने की कानूनी कसौटी को पूरा नहीं करता।
अदालत की यह टिप्पणी उन मामलों के संदर्भ में महत्वपूर्ण है, जहां प्रेम संबंध खत्म होने या विवाह से इनकार के बाद आत्महत्या की घटना सामने आती है। ऐसे मामलों में आत्महत्या के लिए उकसाने का आरोप लगाने के लिए केवल रिश्ते के टूटने की घटना पर्याप्त नहीं होगी। इसके लिए आरोपी की ओर से आत्महत्या के लिए उकसाने या मजबूर करने से जुड़ी ठोस सामग्री का होना जरूरी है।
सुप्रीम कोर्ट ने इसी आधार पर छह आरोपियों के खिलाफ चल रही आपराधिक कार्रवाई को समाप्त कर दिया।











