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न्याय व्यवस्था में एकरूपता लाने की तैयारी, सुप्रीम कोर्ट ने ई-कमेटी को ज्ञापन देने की दी अनुमति

नई दिल्ली, दिल्ली। देश की न्याय व्यवस्था में पारदर्शिता, सरलता और एकरूपता सुनिश्चित करने की दिशा में सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण कदम उठाया है। शीर्ष अदालत ने देश के सभी उच्च न्यायालयों में मुकदमों के नामकरण, पंजीकरण प्रक्रिया और न्यायिक शब्दावली को एक समान बनाने की मांग पर याचिकाकर्ता अश्विनी उपाध्याय को ई-कमेटी के समक्ष विस्तृत ज्ञापन सौंपने की अनुमति दी है। इस पहल का उद्देश्य न्यायिक प्रक्रियाओं को अधिक व्यवस्थित और आम लोगों के लिए समझने योग्य बनाना है।

 

को प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय पीठ ने इस मामले की सुनवाई की। पीठ में न्यायमूर्ति जोयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना भी शामिल थे। सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने जनहित याचिका को न्यायिक पक्ष पर सुनने से इनकार कर दिया। हालांकि, पीठ ने यह भी माना कि याचिकाकर्ता की ओर से उठाया गया विषय प्रासंगिक है और न्यायिक व्यवस्था के व्यापक हित से जुड़ा हुआ है।

याचिकाकर्ता अश्विनी उपाध्याय ने देश के सभी उच्च न्यायालयों में मुकदमों के नामकरण और पंजीकरण की प्रक्रिया को एक समान बनाने की मांग उठाई है। इसके साथ ही न्यायालयों में इस्तेमाल होने वाली कानूनी और न्यायिक शब्दावली के मानकीकरण का मुद्दा भी शामिल है।

दरअसल, देश के विभिन्न उच्च न्यायालयों में मुकदमों की श्रेणियों, उनके नामकरण और पंजीकरण से संबंधित प्रक्रियाओं में अंतर देखने को मिलता है। अलग-अलग शब्दावली और प्रक्रियाओं के कारण न्यायिक कामकाज में एकरूपता बनाए रखने की चुनौती सामने आती है। यदि इन प्रक्रियाओं के लिए एक समान मानक विकसित किए जाते हैं, तो न्यायिक व्यवस्था को अधिक व्यवस्थित बनाने में मदद मिल सकती है।

इस तरह के मानकीकरण से केवल न्यायालयों के प्रशासनिक कामकाज को ही नहीं, बल्कि वकीलों और आम वादकारियों को भी लाभ मिलने की उम्मीद है। मुकदमों की पहचान, दस्तावेजों के पंजीकरण और न्यायिक प्रक्रियाओं को समझना अधिक आसान हो सकता है। साथ ही विभिन्न उच्च न्यायालयों के बीच प्रक्रियागत समन्वय बेहतर बनाने में भी सहायता मिल सकती है।

सुनवाई के दौरान कोर्ट फीस से संबंधित विषय पर भी अदालत ने अपना रुख स्पष्ट किया। पीठ ने कहा कि कोर्ट फीस निर्धारित करने का विषय राज्यों के विधायी अधिकार क्षेत्र से जुड़ा है। ऐसे में राज्यों के अधिकारों का सम्मान किया जाना चाहिए।

सुप्रीम कोर्ट की ओर से ई-कमेटी को ज्ञापन सौंपने की अनुमति मिलने से अब इस विषय पर संस्थागत स्तर पर सुझाव प्रस्तुत करने का रास्ता खुल गया है। हालांकि, अदालत ने फिलहाल न्यायिक प्रक्रियाओं में एकरूपता लागू करने का कोई अंतिम आदेश नहीं दिया है। अब इस मामले में आगे की प्रक्रिया ई-कमेटी के समक्ष प्रस्तुत किए जाने वाले ज्ञापन और उस पर होने वाले विचार-विमर्श पर निर्भर करेगी।

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