नई दिल्ली, दिल्ली
देश में इस वर्ष दक्षिण-पश्चिम मानसून की रफ्तार अपेक्षाकृत धीमी बनी हुई है। भारतीय मौसम विज्ञान विभाग (आईएमडी) के आंकड़ों के अनुसार 27 जून तक मानसून देश के केवल 55 प्रतिशत हिस्से तक ही पहुंच सका है। हालांकि विशेषज्ञों का कहना है कि मानसून की धीमी प्रगति का मतलब यह नहीं है कि पूरे सीजन में कम बारिश होगी। पिछले 25 वर्षों के आंकड़े बताते हैं कि कई बार देर से पहुंचने वाला मानसून भी सामान्य या सामान्य से अधिक वर्षा लेकर आया है।
इस बार मानसून महाराष्ट्र से आगे बढ़ते हुए मध्य प्रदेश और बिहार के कुछ हिस्सों तक पहुंचा है। वहीं देश की आर्थिक राजधानी मुंबई में मानसून लगभग 12 दिनों की देरी से पहुंचा, जिससे शुरुआती दिनों में लोगों को गर्मी और उमस का सामना करना पड़ा। कई राज्यों में किसान भी बारिश का इंतजार कर रहे हैं ताकि खरीफ फसलों की बुवाई तेजी से शुरू हो सके।
मौसम वैज्ञानिकों का कहना है कि मानसून की वर्तमान स्थिति के पीछे अल नीनो का प्रभाव एक महत्वपूर्ण कारण माना जा रहा है। इससे पहले वर्ष 2002 में भी जून के अंत तक मानसून देश के लगभग 50 से 55 प्रतिशत हिस्से तक ही पहुंच पाया था। उस वर्ष मानसून ने पूरे देश को अगस्त के मध्य तक कवर किया था, जिससे बारिश का वितरण काफी प्रभावित हुआ था।
हालांकि केवल मानसून के देर से पहुंचने के आधार पर सूखे की आशंका जताना उचित नहीं माना जा रहा है। पिछले 25 वर्षों के रिकॉर्ड बताते हैं कि 14 बार मानसून की चाल सामान्य से धीमी रही, लेकिन इनमें से सात अवसरों पर पूरे मानसून सीजन के दौरान सामान्य या उससे अधिक वर्षा दर्ज की गई। इससे यह स्पष्ट होता है कि शुरुआती देरी पूरे सीजन की बारिश का सटीक संकेतक नहीं होती।
अल नीनो के प्रभाव वाले वर्षों का विश्लेषण भी यही बताता है कि हर बार इसके कारण सूखा नहीं पड़ा। वर्ष 2019 इसका सबसे बड़ा उदाहरण है, जब अल नीनो की स्थिति बनने के बावजूद देश में सामान्य से करीब 10 प्रतिशत अधिक वर्षा दर्ज की गई थी। यही कारण है कि मौसम विशेषज्ञ फिलहाल किसी भी तरह की नकारात्मक संभावना पर पहुंचने से बचने की सलाह दे रहे हैं।
आईएमडी का कहना है कि आगामी दिनों में मानसून के सक्रिय होने की संभावना बनी हुई है। यदि जुलाई के पहले और दूसरे सप्ताह में अच्छी बारिश होती है तो कृषि, जलाशयों और पेयजल आपूर्ति की स्थिति में तेजी से सुधार आ सकता है। ऐसे में किसानों और आम लोगों को फिलहाल घबराने की बजाय मौसम विभाग के नियमित अपडेट पर नजर रखने की सलाह दी जा रही है।











