**नई दिल्ली, दिल्ली**
मृत्युदंड को लागू करने के तरीके को लेकर सुप्रीम कोर्ट में चल रही बहस ने देशभर का ध्यान खींचा है। सुप्रीम कोर्ट की जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ ने फांसी की मौजूदा व्यवस्था को बदलने और कम पीड़ादायक विकल्प अपनाने की मांग वाली याचिका पर 22 जनवरी 2026 को अपना फैसला सुरक्षित रख लिया। महत्वपूर्ण बात यह है कि उपलब्ध रिपोर्टों के अनुसार अदालत ने इस याचिका को खारिज नहीं किया है।
यह मामला अधिवक्ता ऋषि मल्होत्रा की ओर से दायर याचिका से जुड़ा है। वर्ष 2017 में दाखिल याचिका में मौत की सजा के निष्पादन के लिए फांसी के प्रावधान की संवैधानिक वैधता को चुनौती दी गई थी। बाद की सुनवाई में याचिकाकर्ता ने फांसी की जगह कम पीड़ादायक और अधिक मानवीय तरीकों को अपनाने की मांग की।
याचिकाकर्ता की ओर से घातक इंजेक्शन समेत कई वैकल्पिक तरीकों का मुद्दा उठाया गया। उनका तर्क था कि मृत्युदंड की प्रक्रिया ऐसी होनी चाहिए, जिसमें अनावश्यक पीड़ा कम से कम हो और दोषी की मानवीय गरिमा का सम्मान किया जाए। इस तर्क को संविधान के अनुच्छेद 21 में मिले जीवन और गरिमा के अधिकार से भी जोड़ा गया।
मामले में केंद्र सरकार की भूमिका भी अहम है। जनवरी 2026 की सुनवाई के दौरान अटॉर्नी जनरल आर. वेंकटरमणी ने सुप्रीम कोर्ट को बताया कि सरकार इस मुद्दे की उच्चतम स्तर पर जांच कर रही है। अदालत के सामने यह भी स्पष्ट किया गया कि वैकल्पिक तरीकों से जुड़े पहलुओं पर विचार किया जा रहा है। दलीलें सुनने के बाद पीठ ने अपना फैसला सुरक्षित रख लिया।
इससे पहले अक्टूबर 2025 में सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने मृत्युदंड देने के मौजूदा तरीके को लेकर केंद्र की स्थिति पर सवाल उठाए थे। याचिकाकर्ता की ओर से कहा गया था कि फांसी की जगह घातक इंजेक्शन जैसे तरीके पर विचार होना चाहिए। यहां तक कि यह सुझाव भी रखा गया था कि मौत की सजा पाए व्यक्ति को फांसी और घातक इंजेक्शन में से किसी एक को चुनने का विकल्प दिया जा सकता है।
इस मामले की पृष्ठभूमि में यह तथ्य भी महत्वपूर्ण है कि भारतीय कानून में मृत्युदंड के निष्पादन के लिए फांसी का प्रावधान मौजूद है। नए भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता में भी संबंधित प्रावधान बरकरार है।
अब सभी की नजर सुप्रीम कोर्ट के अंतिम आदेश पर है। अदालत के फैसले से यह स्पष्ट हो सकता है कि भविष्य में भारत में मृत्युदंड लागू करने के तरीके में किसी बदलाव की गुंजाइश बनती है या वर्तमान व्यवस्था जारी रहती है।











