ताइपे, ताइवान

चीन के बढ़ते सैन्य दबाव और घरेलू स्तर पर सैनिकों की घटती उपलब्धता के बीच ताइवान ने अपनी रक्षा नीति में महत्वपूर्ण बदलाव की घोषणा की है। सरकार ने रिजर्व सैनिकों के लिए अनिवार्य सैन्य प्रशिक्षण की अवधि 7 दिन से बढ़ाकर 14 दिन कर दी है। इसके साथ ही प्रशिक्षण कार्यक्रम में आधुनिक ड्रोन संचालन और अमेरिका द्वारा विकसित हाई मोबिलिटी आर्टिलरी रॉकेट सिस्टम (HIMARS) को भी शामिल किया गया है।
रिपोर्टों के अनुसार, यह ताइवान की रिजर्व सैन्य व्यवस्था में पिछले कई दशकों का सबसे बड़ा सुधार माना जा रहा है। इसका उद्देश्य रिजर्व बलों को आधुनिक युद्ध की आवश्यकताओं के अनुरूप तैयार करना और किसी भी संभावित सुरक्षा चुनौती का प्रभावी ढंग से सामना करने की क्षमता विकसित करना है।
ताइवान के रक्षा मंत्री वेलिंगटन कू ली-ह्सियुंग ने हाल ही में आयोजित एक विधायी सुनवाई में बताया कि नए प्रशिक्षण कार्यक्रम के तहत रिजर्व सैनिकों को ड्रोन संचालन, आधुनिक हथियार प्रणालियों और HIMARS जैसे उन्नत रॉकेट सिस्टम के उपयोग का व्यावहारिक प्रशिक्षण दिया जाएगा। उनका कहना है कि बदलते युद्ध स्वरूप को देखते हुए तकनीकी दक्षता अब सैन्य तैयारी का महत्वपूर्ण हिस्सा बन चुकी है।
‘साउथ चाइना मॉर्निंग पोस्ट’ की रिपोर्ट के अनुसार, इस वर्ष से पुराने 5 से 7 दिन के रिजर्व कॉल-अप कार्यक्रम की जगह सभी पात्र रिजर्व सैनिकों के लिए 14 दिन का अनिवार्य प्रशिक्षण लागू किया गया है। इस दौरान सैनिकों को वास्तविक परिस्थितियों के अनुरूप अभ्यास कराया जाएगा, जिससे उनकी परिचालन क्षमता में सुधार हो सके।
ताइवान इस समय गिरती जन्म दर की समस्या से भी जूझ रहा है, जिसके कारण सैन्य सेवा के लिए योग्य युवाओं की संख्या लगातार कम होती जा रही है। ऐसे में सरकार सक्रिय सेना के साथ-साथ रिजर्व बलों को अधिक प्रशिक्षित और तकनीकी रूप से सक्षम बनाकर रक्षा तैयारियों को मजबूत करना चाहती है।
रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि ड्रोन तकनीक और HIMARS जैसे आधुनिक हथियार भविष्य के सैन्य अभियानों में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। ऐसे में रिजर्व सैनिकों को इन प्रणालियों का प्रशिक्षण देना ताइवान की दीर्घकालिक रक्षा रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है। हालांकि क्षेत्रीय सुरक्षा से जुड़े मुद्दों पर सभी पक्षों के आधिकारिक रुख और कूटनीतिक प्रयास भी समान रूप से महत्वपूर्ण बने हुए हैं।











