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ड्रोन, AI और मिसाइलों की नई जंग: चीन के सामने कितने दिन टिक पाएगा अमेरिका?

वॉशिंगटन/बीजिंग:

दुनिया की दो सबसे बड़ी महाशक्तियों अमेरिका और चीन के बीच बढ़ता तनाव अब केवल कूटनीतिक बयानबाजी तक सीमित नहीं रह गया है। ताइवान मुद्दे को लेकर दोनों देशों के बीच जिस तरह की तल्खी सामने आ रही है, उसने वैश्विक सुरक्षा और आधुनिक युद्ध की दिशा को लेकर नई बहस छेड़ दी है। विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले समय में युद्ध केवल सैनिकों और टैंकों से नहीं, बल्कि ड्रोन, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI), साइबर तकनीक और मिसाइल नेटवर्क से तय होंगे।

हाल ही में बीजिंग यात्रा के दौरान अमेरिकी राष्ट्रपति Donald Trump के सामने चीन ने अपनी सैन्य ताकत का भव्य प्रदर्शन किया। चीन के राष्ट्रपति Xi Jinping ने ताइवान मुद्दे पर बेहद सख्त संदेश देते हुए साफ कहा कि यदि इस मामले को “सही तरीके” से नहीं संभाला गया, तो अमेरिका और चीन के बीच टकराव की स्थिति बन सकती है।

चीन लंबे समय से Taiwan को अपना हिस्सा मानता है, जबकि ताइवान खुद को अलग लोकतांत्रिक प्रशासन वाला क्षेत्र बताता है। अमेरिका लगातार ताइवान को सैन्य और रणनीतिक समर्थन देता रहा है, जिससे यह मुद्दा दोनों देशों के रिश्तों में सबसे संवेदनशील बिंदु बन चुका है।

विश्लेषकों के अनुसार, इस बार ट्रंप का रवैया भी पहले की तुलना में अलग दिखाई दिया। आमतौर पर आक्रामक अंदाज में नजर आने वाले ट्रंप ने चीन की सैन्य क्षमता को लेकर अपेक्षाकृत संतुलित प्रतिक्रिया दी। उन्होंने सार्वजनिक रूप से चीन की सेना की ताकत को स्वीकार करते हुए कहा कि “मिलिट्री तो साफ दिखाई दे रही है।”

विशेषज्ञ मानते हैं कि चीन अब केवल पारंपरिक सैन्य ताकत तक सीमित नहीं है। उसने ड्रोन तकनीक, एआई आधारित हथियार प्रणाली, साइबर युद्ध और सैटेलाइट नेटवर्क के क्षेत्र में तेजी से निवेश किया है। रिपोर्टों के मुताबिक, हालिया पश्चिम एशिया संघर्षों में भी चीन की तकनीक का प्रभाव देखने को मिला। दावा किया गया कि ईरान ने अपने ड्रोन संचालन में चीन के ‘बेइदौ’ सैटेलाइट नेविगेशन सिस्टम का इस्तेमाल किया।

रक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि भविष्य के युद्धों में वही देश बढ़त बनाएंगे, जो कम लागत में बड़ी संख्या में स्मार्ट हथियार तैयार कर सकें। चीन इस दिशा में तेजी से आगे बढ़ रहा है। उसके पास विशाल औद्योगिक क्षमता, मजबूत सप्लाई चेन और बड़े पैमाने पर उत्पादन की ताकत है। दूसरी ओर, अमेरिका अभी भी दुनिया का सबसे बड़ा रक्षा बजट रखने वाला देश है, लेकिन उसे हथियार उत्पादन की धीमी प्रक्रिया और सीमित स्टॉक जैसी चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है।

रणनीतिक रिपोर्टों के अनुसार, आधुनिक लंबी दूरी की मिसाइलों और उन्नत हथियार प्रणालियों को तैयार करने में कई वर्षों का समय लगता है। ऐसे में यदि अमेरिका और चीन के बीच लंबा सैन्य संघर्ष होता है, तो अमेरिकी हथियार भंडार पर दबाव बढ़ सकता है।

इसी चुनौती से निपटने के लिए अमेरिकी रक्षा विभाग नई रणनीतियों पर काम कर रहा है। ‘हेलस्केप’ नाम की योजना के तहत ताइवान जलडमरूमध्य में बड़े पैमाने पर ड्रोन और स्वचालित हथियार नेटवर्क तैनात करने की तैयारी की जा रही है, ताकि चीन के किसी संभावित हमले को बेहद महंगा और कठिन बनाया जा सके।

वैश्विक सुरक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले वर्षों में युद्ध का चेहरा पूरी तरह बदल जाएगा। भविष्य की लड़ाई केवल सैनिकों की संख्या से नहीं, बल्कि तकनीक, एआई, साइबर क्षमता और औद्योगिक उत्पादन की गति से तय होगी। अमेरिका और चीन के बीच बढ़ती प्रतिस्पर्धा इसी बदलती वैश्विक व्यवस्था का सबसे बड़ा संकेत मानी जा रही है।

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