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यूपीआई एमडीआर पर सियासी घमासान तेज, भर्तृहरि महताब बोले- रिपोर्ट सर्वसम्मति से हुई पास

यूपीआई एमडीआर पर सियासी संग्राम, भर्तृहरि महताब ने कहा- समिति की रिपोर्ट पूरी तरह रिकॉर्ड पर

नई दिल्ली, दिल्ली। यूपीआई पर मर्चेंट डिस्काउंट रेट यानी एमडीआर शुल्क को लेकर सरकार और विपक्ष के बीच विवाद लगातार बढ़ रहा है। वित्त मामलों की संसदीय स्थायी समिति के अध्यक्ष और भाजपा सांसद भर्तृहरि महताब ने समिति की अगस्त 2026 की रिपोर्ट का बचाव करते हुए कहा है कि रिपोर्ट तैयार करने से लेकर उसे अपनाने तक की पूरी प्रक्रिया रिकॉर्ड पर है।

महताब ने विपक्ष के उन आरोपों को खारिज किया कि समिति की रिपोर्ट में डिजिटल भुगतान पर एमडीआर लागू करने की सिफारिश विपक्षी सदस्यों की सहमति के बिना की गई। उन्होंने कहा कि संसदीय समितियां रिपोर्ट तैयार करने के लिए एक निर्धारित प्रक्रिया का पालन करती हैं और इस मामले में भी उसी प्रक्रिया का पालन किया गया।

मामला तब राजनीतिक रूप से गरमा गया, जब कांग्रेस सांसद मनीष तिवारी ने एक्स पर एक पोस्ट के जरिए उन दावों को खारिज किया कि विपक्षी सांसदों ने डिजिटल पेमेंट पर एमडीआर लागू करने के प्रस्ताव का समर्थन किया था। इसके बाद महताब ने समिति की कार्यवाही और रिकॉर्ड का हवाला देते हुए रिपोर्ट का बचाव किया।

2,000 रुपये से अधिक के यूपीआई लेनदेन पर शुल्क का मुद्दा

विवाद का सीधा संबंध मर्चेंट यूपीआई लेनदेन पर एमडीआर शुल्क से है। दिए गए विवरण के अनुसार, एनपीसीआई ने 2,000 रुपये से अधिक के मर्चेंट यूपीआई लेनदेन पर 0.4 प्रतिशत एमडीआर शुल्क लगाने का फैसला किया है। यह शुल्क 15 अक्टूबर 2026 से लागू होने की बात कही गई है।

कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने इस शुल्क को वापस लेने की मांग की है। इसके बाद सरकार और विपक्ष के बीच इस मुद्दे पर राजनीतिक बयानबाजी तेज हो गई है।

सरकार और भाजपा की ओर से संसदीय समिति की अगस्त 2026 की रिपोर्ट को अपने पक्ष में रखा जा रहा है। रिपोर्ट में यूपीआई इकोसिस्टम को आर्थिक रूप से टिकाऊ बनाए रखने के लिए चरणबद्ध राजस्व मॉडल लागू करने की सिफारिश किए जाने की बात कही गई है।

भाजपा का दावा है कि रिपोर्ट स्वीकार किए जाने के समय समिति के कांग्रेस सदस्य पी. चिदंबरम, मनीष तिवारी और गौरव गोगोई मौजूद थे। भाजपा के अनुसार, इन सांसदों ने रिपोर्ट के खिलाफ कोई लिखित असहमति दर्ज नहीं कराई।

दूसरी ओर, विपक्ष यह स्पष्ट करने की कोशिश कर रहा है कि समिति की रिपोर्ट को एमडीआर शुल्क के मौजूदा फैसले के समर्थन के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

राजनीतिक विवाद से आगे बढ़ा मामला

यूपीआई एमडीआर को लेकर जारी बहस अब डिजिटल भुगतान की लागत से आगे निकलकर संसदीय प्रक्रिया तक पहुंच गई है। एक ओर सरकार समिति की रिपोर्ट और उसके सर्वसम्मत तरीके से अपनाए जाने का हवाला दे रही है, वहीं विपक्ष एमडीआर शुल्क के फैसले पर सवाल उठा रहा है।

ऐसे में आने वाले दिनों में यह मुद्दा डिजिटल भुगतान व्यवस्था के साथ-साथ राजनीतिक बहस का भी महत्वपूर्ण विषय बना रह सकता है।

 

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