नई दिल्ली, दिल्ली। कैंसर के इलाज में इस्तेमाल होने वाली दवाओं की कीमतों को नियंत्रित करने के लिए किए गए प्रयासों के बावजूद कई दवाओं पर भारी मार्क-अप दर्ज किया गया है। राष्ट्रीय औषधि मूल्य निर्धारण प्राधिकरण (NPPA) की वर्ष 2026 की सूची से जुड़े आंकड़ों के अनुसार, कई कैंसर रोधी दवाओं पर कीमतों में हालिया कटौती से पहले मार्क-अप 100 प्रतिशत से लेकर 700 प्रतिशत से अधिक तक था। यह स्थिति वर्ष 2019 में लागू की गई 30 प्रतिशत ट्रेड मार्जिन सीमा की प्रभावशीलता पर सवाल खड़े करती है।
फरवरी 2019 में NPPA ने चुनिंदा कैंसर रोधी दवाओं के ट्रेड मार्जिन को सीमित करने का फैसला किया था। इसका उद्देश्य दवाओं की कीमतों में कमी लाना और मरीजों को राहत देना था। लेकिन हालिया आंकड़ों से पता चलता है कि उस समय की सूची में शामिल कई दवाओं के मार्क-अप में बाद के वर्षों में फिर वृद्धि हुई।
2019 और 2026 के आंकड़ों में क्या अंतर है?
NPPA की 2026 की सूची में 137 कैंसर रोधी दवाएं शामिल हैं। इनमें से 34 दवाएं ऐसी हैं, जिन्हें वर्ष 2019 की 42 दवाओं वाली सूची में भी जगह मिली थी। आंकड़ों के मुताबिक, इन दवाओं के कई ब्रांडों का मार्क-अप नवीनतम मूल्य कटौती से पहले निर्धारित तुलनीय स्तर से काफी अधिक था।
यहां ट्रेड मार्जिन और मार्क-अप के बीच का अंतर महत्वपूर्ण है। ट्रेड मार्जिन की गणना अंतिम खुदरा कीमत के आधार पर होती है, जबकि मार्क-अप स्टॉकिस्ट को दी जाने वाली कीमत की तुलना में मापा जाता है। इसलिए 30 प्रतिशत ट्रेड मार्जिन के बराबर मार्क-अप लगभग 43 प्रतिशत होता है।
आंकड़ों में केवल पांच ब्रांड ऐसे बताए गए, जिनका मार्क-अप नवीनतम आदेश से पहले 43 प्रतिशत था। चार ब्रांडों में यह 43 से 100 प्रतिशत के बीच रहा, जबकि अन्य 39 ब्रांडों का मार्क-अप 100 प्रतिशत से 700 प्रतिशत से अधिक तक दर्ज किया गया।
दवा की कीमतों में कटौती के अलग-अलग उदाहरण
पेमेट्रेक्सेड के एक ब्रांड की कीमत में वर्ष 2019 के दौरान बड़ी कटौती की गई थी। इसकी अधिकतम खुदरा कीमत 7,000 रुपये से घटाकर 800 रुपये कर दी गई थी। वहीं, हालिया मूल्य कटौती में इसकी कीमत 1,095 रुपये से घटाकर 297 रुपये की गई।
इन आंकड़ों से पता चलता है कि अलग-अलग दवाओं और ब्रांडों की कीमतों में समय के साथ अलग-अलग स्तर पर बदलाव हुआ। जिन दवाओं की कीमतें वर्ष 2019 में काफी कम की गई थीं, उनमें कुछ मामलों में हालिया कटौती प्रतिशत के आधार पर कम रही। इसके विपरीत, कुछ दवाओं में इस बार अधिक कटौती देखने को मिली।
AIDAN ने उठाए व्यवस्था पर सवाल
सस्ती दवाओं की उपलब्धता के लिए काम करने वाले ऑल इंडिया ड्रग एक्शन नेटवर्क (AIDAN) ने कहा है कि दवाओं की कीमतों में केवल एक बार कमी करना पर्याप्त नहीं है। संगठन की मालिनी ऐसोला के अनुसार, यदि मार्क-अप को दोबारा बढ़ने से रोकने के लिए नियमित निगरानी की व्यवस्था नहीं होगी, तो कीमतें फिर बढ़ सकती हैं।
उन्होंने मौजूदा व्यवस्था को वास्तविक अर्थों में स्थायी ट्रेड मार्जिन सीमा मानने पर भी सवाल उठाया। संगठन का कहना है कि कीमतों में एक बार की कटौती और लंबे समय तक लागू रहने वाले प्रभावी मूल्य नियंत्रण के बीच अंतर है।
किफायती इलाज के लिए निरंतर निगरानी जरूरी
कैंसर का इलाज कई मरीजों के लिए लंबे समय तक चलने वाली प्रक्रिया है। ऐसे में दवाओं की कीमतें परिवारों के कुल चिकित्सा खर्च को प्रभावित करती हैं। उपलब्ध आंकड़ों ने यह सवाल फिर खड़ा किया है कि कीमतों में कटौती के बाद भी दवाओं को किफायती बनाए रखने के लिए किस तरह की निगरानी व्यवस्था लागू होनी चाहिए।
विशेषज्ञता रखने वाले संगठनों की मांग है कि मूल्य नियंत्रण की व्यवस्था ऐसी हो, जिससे दवाओं की कीमतों में दोबारा होने वाली वृद्धि पर नजर रखी जा सके और मरीजों को लंबे समय तक राहत मिल सके।











