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‘जमीन के मालिकाना हक का विवाद होने से मुआवजा नहीं रोक सकते', हिमाचल हाई कोर्ट का फैसला; भवन बनाने वाला हकदार

शिमला, हिमाचल प्रदेश। जमीन के स्वामित्व को लेकर अदालत में मुकदमा चल रहा हो, तब भी उस पर बने भवन के मुआवजे का फैसला अलग आधार पर किया जा सकता है। हिमाचल प्रदेश हाई कोर्ट ने भूमि अधिग्रहण से जुड़े एक मामले में यह बात स्पष्ट की है। अदालत के अनुसार, अधिग्रहीत ढांचे का मुआवजा उस व्यक्ति को मिल सकता है जिसने अपने खर्च पर निर्माण कराया हो और जिसका दावा सार्वजनिक रिकॉर्ड से समर्थित हो।

न्यायमूर्ति संदीप शर्मा ने नेरचौक-मनाली फोरलेन से संबंधित यज्ञ चंद के मामले में यह आदेश दिया।

जमीन और निर्माण के मुआवजे में अंतर

हाई कोर्ट ने कहा कि अधिग्रहीत भूमि पर बने मकान, अन्य ढांचों और किए गए सुधारों के लिए मुआवजा स्वतंत्र रूप से देय हो सकता है। जमीन के मालिकाना हक को लेकर विवाद लंबित होने का अर्थ यह नहीं है कि भवन के मुआवजे का भुगतान भी अनिश्चितकाल तक रोक दिया जाए।

अदालत के मुताबिक, संबंधित ढांचे का निर्माण कराने वाले व्यक्ति का दावा उसके निर्माण, कब्जे, उससे मिलने वाले लाभ और उपलब्ध रिकॉर्ड के आधार पर देखा जा सकता है। हालांकि, मुआवजे का अधिकार तय करते समय मामले के तथ्यों और कानूनी शर्तों को ध्यान में रखना जरूरी होगा।

गुरुद्वारा समिति का मुकदमा जमीन तक सीमित

इस मामले में गुरुद्वारा समिति ने जमीन के संबंध में दीवानी मुकदमा दायर किया था। उपलब्ध विवरण के अनुसार, समिति ने अपने दावे में यह नहीं कहा था कि विवादित भवन का निर्माण गुरुद्वारे की ओर से कराया गया था।

यह तथ्य भवन के मुआवजे के दावे पर विचार करते समय महत्वपूर्ण था। अदालत ने स्पष्ट किया कि जमीन के स्वामित्व को लेकर चल रहे विवाद के आधार पर भवन के मुआवजे को स्वतः रोकना उचित नहीं होगा।

अधिग्रहण से प्रभावित लोगों के लिए अहम

सड़क निर्माण और अन्य सार्वजनिक परियोजनाओं के दौरान भूमि अधिग्रहण होने पर कई बार जमीन तथा उस पर बने निर्माण के अधिकारों को लेकर अलग-अलग दावे सामने आते हैं। ऐसे मामलों में मुआवजे का निर्धारण करते समय जमीन के स्वामित्व और भवन के निर्माण से जुड़े अधिकारों की अलग-अलग जांच की जा सकती है।

हाई कोर्ट का यह आदेश इसी अंतर को रेखांकित करता है। इससे यह स्पष्ट होता है कि भवन बनाने वाले व्यक्ति के मुआवजे के दावे पर केवल जमीन के मालिकाना हक से जुड़े विवाद के कारण रोक नहीं लगाई जानी चाहिए। हालांकि, वास्तविक हकदार का निर्धारण संबंधित दस्तावेजों और मामले के तथ्यों के आधार पर ही होगा।

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