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अंतरिक्ष में अमेरिका ने तैनात किए हथियार! ‘स्पेस वॉर’ का खतरा बढ़ा, 1967 की संधि पर उठे सवाल

मुंबई, महाराष्ट्र

अमेरिका ने पहली बार सार्वजनिक रूप से ऑन-ऑर्बिट स्पेस कंट्रोल क्षमताओं की तैनाती स्वीकार की; उपग्रहों को बाधित या नुकसान पहुंचाने की क्षमता का दावा

अंतरिक्ष में सैन्य गतिविधियों को लेकर अमेरिका की ओर से सामने आया एक बड़ा खुलासा दुनिया का ध्यान खींच रहा है। अमेरिका ने पहली बार सार्वजनिक रूप से स्वीकार किया है कि उसने अंतरिक्ष में ‘ऑन-ऑर्बिट स्पेस कंट्रोल’ क्षमताएं तैनात की हैं। इनका इस्तेमाल जरूरत पड़ने पर विरोधी देश की अंतरिक्ष क्षमताओं को बाधित करने, कमजोर करने या नुकसान पहुंचाने के लिए किया जा सकता है।

अमेरिकी वायु सेना के सचिव ट्राय मींक की ओर से यह जानकारी सामने आने के बाद अंतरिक्ष में हथियारों की बढ़ती होड़ और संभावित ‘स्पेस वॉर’ को लेकर आशंकाएं बढ़ गई हैं। हालांकि, अमेरिका ने यह स्पष्ट नहीं किया है कि अंतरिक्ष में किस तरह के सिस्टम तैनात किए गए हैं, उनकी संख्या कितनी है और उन्हें कब कक्षा में भेजा गया।

क्या हैं ‘ऑन-ऑर्बिट स्पेस कंट्रोल’ हथियार?

अमेरिकी स्पेस फोर्स के अनुसार, स्पेस कंट्रोल क्षमताओं में काइनेटिक और नॉन-काइनेटिक दोनों तरह के तरीके शामिल हो सकते हैं।

काइनेटिक क्षमता का संबंध ऐसी प्रत्यक्ष कार्रवाई से है, जिसमें किसी अंतरिक्ष वस्तु या उपग्रह को भौतिक रूप से नुकसान पहुंचाया जा सकता है। वहीं नॉन-काइनेटिक तरीकों में उपग्रह को नष्ट किए बिना उसकी क्षमता को प्रभावित करने की कोशिश की जाती है। इसमें संचार या सिग्नल को जाम करना अथवा अन्य तकनीकी माध्यमों से उपग्रह की सेवाओं में बाधा डालना शामिल हो सकता है।

उपग्रहों पर क्यों टिकी है सैन्य ताकत?

आज के दौर में उपग्रह केवल टीवी प्रसारण या इंटरनेट सेवाओं तक सीमित नहीं हैं। सैन्य क्षेत्र में इनका इस्तेमाल सुरक्षित संचार, नेविगेशन, निगरानी, खुफिया जानकारी और मिसाइल चेतावनी जैसी महत्वपूर्ण सेवाओं के लिए किया जाता है।

ऐसे में किसी देश के सैन्य उपग्रहों को बाधित करने की क्षमता युद्ध की स्थिति में रणनीतिक बढ़त दे सकती है। यही वजह है कि अमेरिका की स्वीकारोक्ति को अंतरिक्ष में बढ़ती सैन्य प्रतिस्पर्धा के संकेत के तौर पर देखा जा रहा है।

1967 की बाह्य अंतरिक्ष संधि क्यों चर्चा में?

इस खुलासे ने करीब छह दशक पुरानी 1967 की बाह्य अंतरिक्ष संधि को लेकर भी बहस तेज कर दी है। इस संधि में अंतरिक्ष में परमाणु हथियारों और सामूहिक विनाश के अन्य हथियारों की तैनाती पर रोक लगाई गई है।

हालांकि, पारंपरिक या गैर-विनाशकारी अंतरिक्ष हथियारों और इलेक्ट्रॉनिक युद्ध क्षमताओं को लेकर स्थिति अलग है। यही कारण है कि अंतरिक्ष में बढ़ती सैन्य गतिविधियों को नियंत्रित करने के लिए अंतरराष्ट्रीय नियमों को लेकर चर्चा लगातार महत्वपूर्ण होती जा रही है।

आगे क्या?

अमेरिका ने अपनी तैनात क्षमताओं की पूरी जानकारी सार्वजनिक नहीं की है। ऐसे में इनकी वास्तविक क्षमता और संभावित इस्तेमाल को लेकर कई सवाल अभी अनुत्तरित हैं।

लेकिन इतना स्पष्ट है कि अंतरिक्ष अब केवल वैज्ञानिक अनुसंधान का क्षेत्र नहीं रहा। वैश्विक शक्तियां इसे राष्ट्रीय सुरक्षा और सैन्य रणनीति के एक महत्वपूर्ण मोर्चे के रूप में देख रही हैं। अमेरिका का यह खुलासा आने वाले समय में अंतरिक्ष में हथियारों की होड़ और नए अंतरराष्ट्रीय नियमों की मांग, दोनों को बढ़ा सकता है।

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