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ईरान-अमेरिका वार्ता: दबाव के बीच तेहरान ने खुद को बताया विजेता

अमेरिका और ईरान के बीच संभावित शांति समझौते को लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चर्चाएं तेज हो गई हैं। इस बीच ईरान लगातार यह संदेश देने की कोशिश कर रहा है कि उसने भारी सैन्य और आर्थिक दबाव के बावजूद अमेरिका को बातचीत की मेज पर आने के लिए मजबूर किया है। तेहरान की ओर से इसे केवल कूटनीतिक सफलता नहीं बल्कि रणनीतिक जीत के रूप में भी पेश किया जा रहा है।

ईरानी नेतृत्व और सरकारी मीडिया में इन दिनों यही नैरेटिव प्रमुखता से दिख रहा है कि अमेरिका और इजरायल लंबे समय से ईरान पर दबाव बनाने की कोशिश कर रहे थे, लेकिन ईरान ने झुकने के बजाय प्रतिरोध का रास्ता चुना। अब जब दोनों देशों के बीच समझौते की संभावना बन रही है, तो इसे ईरान अपनी ताकत और धैर्य की जीत बता रहा है।

ईरान के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता इस्माइल बघाई ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर एक ऐतिहासिक संदर्भ साझा करते हुए कहा कि जैसे कभी रोमन साम्राज्य की अजेयता का भ्रम टूटा था, उसी तरह आज ईरान ने दुनिया की बड़ी ताकतों के सामने घुटने टेकने से इनकार कर दिया। उनके इस बयान को अमेरिका-ईरान वार्ता से जोड़कर देखा जा रहा है।

विशेषज्ञों का मानना है कि समझौते का अंतिम स्वरूप सामने आने से पहले यह तय करना मुश्किल है कि वास्तविक लाभ किसे मिलेगा। हालांकि, ईरान घरेलू राजनीति और क्षेत्रीय प्रभाव के स्तर पर इसे अपने पक्ष में भुनाने की पूरी कोशिश करेगा। यूरोपियन काउंसिल ऑन फॉरेन रिलेशंस की विश्लेषक एली गेरानमायेह के अनुसार, कुछ महीने पहले तक अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप “बिना शर्त आत्मसमर्पण” जैसी भाषा का इस्तेमाल कर रहे थे, लेकिन अब बातचीत के जरिए समाधान खोजा जा रहा है। इससे ईरान अपने नागरिकों को यह संदेश देना चाहता है कि उसने दबाव के सामने झुकने के बजाय मजबूती दिखाई।

न्यूयॉर्क टाइम्स की एक रिपोर्ट में भी कहा गया है कि ईरान खुद को मजबूत स्थिति में इसलिए महसूस कर रहा है क्योंकि उसने होर्मुज जलडमरूमध्य पर अपनी पकड़ और वैश्विक तेल आपूर्ति को प्रभावित करने की क्षमता का संकेत दिया। यह क्षेत्र अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा बाजार के लिए बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है।

हालांकि, ईरान की स्थिति पूरी तरह मजबूत नहीं कही जा सकती। लंबे समय से जारी आर्थिक प्रतिबंधों और युद्ध जैसी परिस्थितियों ने उसकी अर्थव्यवस्था को गंभीर नुकसान पहुंचाया है। स्टील, पेट्रोकेमिकल और तेल उद्योग पर इसका बड़ा असर पड़ा है। महंगाई और बेरोजगारी भी देश के भीतर बड़ी चुनौती बनी हुई है।

ऐसे में यदि संभावित समझौते के तहत ईरान को तेल निर्यात में राहत मिलती है या विदेशों में जमे उसके फंड तक पहुंच बहाल होती है, तो यह उसकी अर्थव्यवस्था के लिए बड़ी राहत साबित हो सकता है। राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि तेहरान इसे घरेलू जनता के सामने बड़ी उपलब्धि के रूप में पेश करेगा।

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