नई दिल्ली, भारत। चीनी की बढ़ती कीमतों को नियंत्रित करने और घरेलू बाजार में पर्याप्त उपलब्धता बनाए रखने के लिए सरकार ने एथनॉल खरीद नीति में बदलाव किया है। नई व्यवस्था के तहत सरकारी तेल विपणन कंपनियां गन्ने के रस, चीनी के सिरप और बी-हेवी शीरे से तैयार एथनॉल नहीं खरीद सकेंगी। सरकार की इस पहल का मकसद गन्ने का अधिक हिस्सा चीनी उत्पादन के लिए उपलब्ध कराना है।
वैकल्पिक स्रोतों से होगी एथनॉल की खरीद
तेल विपणन कंपनियों ने 1100 करोड़ लीटर एथनॉल खरीदने के लिए निविदा जारी की है। इस निविदा में गन्ने के रस, चीनी के सिरप और बी-हेवी शीरे से तैयार एथनॉल को शामिल नहीं किया गया है। वहीं, मक्का, टूटे अनाज, भारतीय खाद्य निगम से खरीदे जाने वाले अतिरिक्त चावल और सी-हेवी शीरे से बने एथनॉल की खरीद की अनुमति दी गई है।
इस बदलाव से एथनॉल उत्पादन के लिए वैकल्पिक कच्चे माल के इस्तेमाल को बढ़ावा मिल सकता है। साथ ही, चीनी उत्पादन में इस्तेमाल होने वाले गन्ने और उससे जुड़े संसाधनों को घरेलू बाजार की जरूरतों के लिए उपलब्ध रखने में मदद मिल सकती है।
पिछले वर्ष 29 लाख टन चीनी का हुआ इस्तेमाल
उपलब्ध जानकारी के मुताबिक, पिछले वर्ष एथनॉल उत्पादन के लिए लगभग 29 लाख टन चीनी का इस्तेमाल किया गया था। इस मात्रा का चीनी की घरेलू उपलब्धता पर असर पड़ सकता है, खासकर उस स्थिति में जब बाजार में मांग बढ़ रही हो और कीमतों में तेजी देखी जा रही हो।
सरकार की नई नीति का उद्देश्य एथनॉल उत्पादन को वैकल्पिक स्रोतों की ओर बढ़ाना और चीनी की आपूर्ति को बेहतर बनाए रखना है। इससे चीनी उद्योग और एथनॉल क्षेत्र के बीच कच्चे माल के इस्तेमाल में बदलाव आने की संभावना है।
उपभोक्ताओं को कब मिलेगी राहत?
चीनी की कीमतों में तेजी के बीच इस फैसले से उपभोक्ताओं को राहत मिलने की उम्मीद की जा रही है। हालांकि, केवल एथनॉल खरीद नीति में बदलाव से चीनी सस्ती होने की गारंटी नहीं है। कीमतों पर वास्तविक असर इस बात से तय होगा कि बाजार में चीनी का उत्पादन कितना रहता है, मांग कैसी रहती है और उपलब्ध स्टॉक किस स्तर पर है।
नई नीति के प्रभाव का आकलन आने वाले समय में किया जा सकेगा। फिलहाल सरकार का जोर चीनी की घरेलू उपलब्धता बनाए रखने और कीमतों में अनावश्यक तेजी को नियंत्रित करने पर है।











