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ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट: हिंद महासागर में भारत की बड़ी रणनीतिक चाल, चीन की ‘मलक्का दुविधा’ हो सकती है गहरी

नई दिल्ली: हिंद महासागर क्षेत्र में अपनी सामरिक और आर्थिक स्थिति को मजबूत करने के लिए भारत जिस ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट पर काम कर रहा है, उसे हाल के वर्षों की सबसे महत्वपूर्ण भू-राजनीतिक पहलों में से एक माना जा रहा है। करीब 9 अरब डॉलर की लागत वाली इस परियोजना के जरिए भारत न केवल एक वैश्विक समुद्री व्यापार केंद्र विकसित करना चाहता है, बल्कि मलक्का जलडमरूमध्य के आसपास अपनी रणनीतिक मौजूदगी को भी मजबूत करने की तैयारी में है।

ग्रेट निकोबार द्वीप अंडमान और निकोबार द्वीप समूह का सबसे दक्षिणी हिस्सा है। इसकी स्थिति ऐसी है कि यह हिंद महासागर और दक्षिण-पूर्व एशिया के बीच होने वाली समुद्री गतिविधियों पर नजर रखने के लिए बेहद अहम माना जाता है। इसी कारण रक्षा और कूटनीतिक विशेषज्ञ इस परियोजना को भारत की दीर्घकालिक समुद्री रणनीति का केंद्र बिंदु बता रहे हैं।

परियोजना के तहत गालाथिया खाड़ी में एक अंतरराष्ट्रीय कंटेनर ट्रांसशिपमेंट पोर्ट, नागरिक और सैन्य उपयोग वाला एयरपोर्ट, ऊर्जा अवसंरचना, पर्यटन सुविधाएं और एक आधुनिक टाउनशिप विकसित की जाएगी। सरकार का लक्ष्य इसे आने वाले दशकों में हिंद महासागर क्षेत्र के प्रमुख आर्थिक और लॉजिस्टिक्स हब के रूप में विकसित करना है।

मलक्का स्ट्रेट क्यों है इतना महत्वपूर्ण?

मलक्का जलडमरूमध्य दुनिया के सबसे व्यस्त समुद्री मार्गों में गिना जाता है। हिंद महासागर को प्रशांत महासागर से जोड़ने वाला यह रास्ता वैश्विक व्यापार और ऊर्जा आपूर्ति की जीवनरेखा माना जाता है। दुनिया के बड़े हिस्से का समुद्री व्यापार और तेल परिवहन इसी मार्ग से गुजरता है।

चीन के लिए यह मार्ग विशेष रूप से महत्वपूर्ण है क्योंकि उसके ऊर्जा आयात और निर्यात व्यापार का बड़ा हिस्सा इसी रास्ते पर निर्भर है। यही वजह है कि बीजिंग लंबे समय से वैकल्पिक मार्गों और आर्थिक गलियारों के विकास पर जोर देता रहा है ताकि उसकी निर्भरता कम हो सके।

भारत को कैसे मिलेगी रणनीतिक बढ़त?

विश्लेषकों के अनुसार, ग्रेट निकोबार में विकसित होने वाला बुनियादी ढांचा भारत को समुद्री क्षेत्र की निगरानी और समुद्री गतिविधियों की बेहतर जानकारी हासिल करने में मदद करेगा। इससे भारत को पूर्वी हिंद महासागर में अधिक सक्रिय और स्थायी उपस्थिति मिल सकती है।

विशेषज्ञों का मानना है कि यह परियोजना भारत को केवल रक्षा क्षेत्र में ही नहीं बल्कि कूटनीतिक और आर्थिक मोर्चे पर भी मजबूती प्रदान करेगी। हिंद महासागर क्षेत्र में बढ़ते वैश्विक प्रतिस्पर्धी माहौल के बीच यह भारत की रणनीतिक स्थिति को और मजबूत बना सकती है।

व्यापार और अर्थव्यवस्था को भी होगा लाभ

ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट का एक महत्वपूर्ण पहलू इसका आर्थिक प्रभाव भी है। भारत का बड़ा हिस्सा विदेशी ट्रांसशिपमेंट हब जैसे कोलंबो और सिंगापुर के माध्यम से संचालित होता है। नया गहरे पानी का बंदरगाह बनने से भारत को इन बंदरगाहों पर निर्भरता कम करने में मदद मिल सकती है।

इससे न केवल लॉजिस्टिक्स लागत कम होगी, बल्कि कंटेनर हैंडलिंग, शिपिंग सेवाओं और समुद्री व्यापार से होने वाली आय का बड़ा हिस्सा देश के भीतर ही रह सकेगा। विशेषज्ञों का मानना है कि यह भारत को क्षेत्रीय समुद्री व्यापार का प्रमुख केंद्र बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम साबित हो सकता है।

पर्यावरण और विकास के बीच संतुलन की चुनौती

हालांकि परियोजना को लेकर उत्साह है, लेकिन पर्यावरणविदों और स्थानीय समुदायों ने कुछ चिंताएं भी जताई हैं। ग्रेट निकोबार जैव विविधता से समृद्ध क्षेत्र है और यहां कई संवेदनशील पारिस्थितिक तंत्र मौजूद हैं। साथ ही यहां आदिवासी समुदायों का भी निवास है, जिनकी जीवनशैली प्राकृतिक संसाधनों पर आधारित है।

सरकार का कहना है कि परियोजना को पर्यावरणीय मानकों का पालन करते हुए विकसित किया जाएगा। फिर भी विकास और संरक्षण के बीच संतुलन बनाए रखना भविष्य की सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक माना जा रहा है।

ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट को केवल एक इंफ्रास्ट्रक्चर योजना नहीं, बल्कि भारत की समुद्री शक्ति, आर्थिक महत्वाकांक्षा और रणनीतिक दृष्टि के प्रतीक के रूप में देखा जा रहा है। आने वाले वर्षों में यह परियोजना हिंद महासागर क्षेत्र की भू-राजनीति और व्यापारिक परिदृश्य पर गहरा प्रभाव डाल सकती है।

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