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पत्रकारिता पर DPDP एक्ट के असर को लेकर सरकार गंभीर, जरूरत पड़ी तो कानून में भी होगा बदलाव

नई दिल्ली, दिल्ली। डिजिटल व्यक्तिगत डेटा संरक्षण अधिनियम (DPDP एक्ट) को लेकर केंद्र सरकार ने महत्वपूर्ण संकेत दिए हैं। सरकार पत्रकारों और मीडिया संस्थानों की चिंताओं को दूर करने के लिए कानून के नियमों में संशोधन कर सकती है। जरूरत पड़ने पर अधिनियम में बदलाव करने का विकल्प भी खुला रखा गया है। सरकार का कहना है कि व्यक्तिगत डेटा की सुरक्षा के लिए बनाए गए प्रावधानों के कारण पत्रकारिता के कामकाज और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ना चाहिए।

इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय के वरिष्ठ अधिकारियों ने कहा है कि कानून में डेटा फिड्यूशियरी की जिम्मेदारियां तय की गई हैं। डेटा फिड्यूशियरी ऐसी संस्था होती है, जो व्यक्तिगत डेटा के प्रसंस्करण के उद्देश्य और तरीके निर्धारित करती है। अधिकारियों के मुताबिक, पत्रकार और मीडिया संस्थान इस श्रेणी में नहीं आते हैं।

मीडिया संस्थानों की चिंता पर सरकार का आश्वासन

डिजिटल समाचार संगठनों ने चिंता जताई है कि DPDP अधिनियम में मीडिया संस्थानों को स्पष्ट छूट नहीं मिलने से पत्रकारिता के कामकाज पर असर पड़ सकता है। समाचार संकलन, तथ्यों की जांच और जनहित से जुड़े मामलों की रिपोर्टिंग के दौरान व्यक्तिगत जानकारी का इस्तेमाल करना पड़ सकता है। ऐसे में मीडिया संगठनों को आशंका है कि कानून के कुछ प्रावधान उनकी गतिविधियों को प्रभावित कर सकते हैं।

मंत्रालय के अधिकारियों ने कहा है कि यदि मौजूदा नियमों को लेकर कोई चिंता सामने आती है, तो उसे दूर करने के लिए उनमें संशोधन किया जा सकता है। यदि आवश्यक हुआ, तो सरकार अधिनियम में बदलाव करने पर भी विचार करेगी। इस बयान से संकेत मिला है कि सरकार मीडिया संस्थानों की आपत्तियों पर विचार करने को तैयार है।

सुप्रीम कोर्ट में पहुंचा मामला

DPDP अधिनियम को लेकर विवाद उस समय और महत्वपूर्ण हो गया, जब सुप्रीम कोर्ट ने डिजिटल न्यूज पब्लिशर्स एसोसिएशन (DNPA) की याचिका पर सुनवाई करने की सहमति दी। यह संगठन देश के 21 प्रमुख समाचार मीडिया संगठनों का प्रतिनिधित्व करता है।

एसोसिएशन ने कानून और इसके तहत बनाए गए नियमों के कई प्रावधानों की वैधता को चुनौती दी है। संगठन का कहना है कि इन प्रावधानों से अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के मौलिक अधिकार पर असर पड़ सकता है। इसके अलावा पत्रकारिता से जुड़ी विभिन्न गतिविधियों के सामने कानूनी और व्यावहारिक चुनौतियां खड़ी होने की आशंका भी जताई गई है।

धारा 7 को लेकर मंत्री ने क्या कहा?

केंद्रीय सूचना और प्रसारण मंत्री अश्विनी वैष्णव ने DPDP अधिनियम की धारा 7 का उल्लेख करते हुए कहा कि इसका संबंध बैंकों, दूरसंचार कंपनियों और बीमा कंपनियों जैसी डेटा फिड्यूशियरी संस्थाओं से है। उन्होंने कहा कि सरकार संविधान के तहत सुनिश्चित स्वतंत्रता और अभिव्यक्ति के अधिकारों की रक्षा के लिए प्रतिबद्ध है।

अधिनियम की धारा 7 में कुछ निर्धारित परिस्थितियों में व्यक्तिगत डेटा के प्रसंस्करण का प्रावधान है। इसके तहत उस उद्देश्य के लिए डेटा का इस्तेमाल किया जा सकता है, जिसके लिए संबंधित व्यक्ति ने स्वेच्छा से अपनी जानकारी दी हो, बशर्ते कानून में निर्धारित शर्तें पूरी हों।

निजता की सुरक्षा और स्वतंत्र पत्रकारिता के बीच संतुलन

DPDP अधिनियम का प्रमुख उद्देश्य लोगों के व्यक्तिगत डेटा की सुरक्षा करना और उसे संभालने वाली संस्थाओं की जवाबदेही तय करना है। दूसरी ओर, मीडिया संगठनों का कहना है कि डेटा संरक्षण के नियम बनाते समय पत्रकारिता की स्वतंत्रता और जनहित में जानकारी जुटाने की जरूरतों को भी ध्यान में रखा जाना चाहिए।

अब इस मामले में सरकार के अगले कदम और सुप्रीम कोर्ट में होने वाली सुनवाई पर नजर रहेगी। नियमों में संशोधन होता है या अधिनियम में बदलाव की जरूरत पड़ती है, यह आगे की प्रक्रिया से स्पष्ट होगा।

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