नई दिल्ली, दिल्ली
सुप्रीम कोर्ट की न्यायाधीश जस्टिस बीवी नागरत्ना ने महिलाओं को किसी घटना के तुरंत बाद कानूनी सहायता उपलब्ध कराने की आवश्यकता पर जोर दिया है। उन्होंने कहा कि महिलाओं को न्याय दिलाने की प्रक्रिया में शुरुआती स्तर पर ही कानूनी मदद मिलना बेहद महत्वपूर्ण है। इसके लिए पुलिस थानों और अस्पतालों जैसे स्थानों पर तत्काल कानूनी सहायता की व्यवस्था विकसित की जानी चाहिए।
जस्टिस नागरत्ना शनिवार को राष्ट्रीय महिला आयोग की ओर से कर्नाटक हाई कोर्ट और कर्नाटक न्यायिक अकादमी के सहयोग से आयोजित दक्षिण क्षेत्रीय सम्मेलन को संबोधित कर रही थीं। सम्मेलन का विषय “महिलाओं के लिए न्याय” था।
अपने संबोधन में उन्होंने कहा कि कानूनी सहायता को जमीनी स्तर तक प्रभावी बनाने के लिए राज्य कानूनी सेवा प्राधिकरणों और स्वास्थ्य तथा पुलिस व्यवस्था के बीच बेहतर समन्वय जरूरी है। उन्होंने सुझाव दिया कि तालुका स्तर तक कानूनी सेवा संस्थाओं का संपर्क प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों, गांवों के सरकारी अस्पतालों और पुलिस स्टेशनों से मजबूत किया जाना चाहिए।
उन्होंने कहा कि किसी घटना के बाद महिला को कानूनी प्रक्रिया समझने और अपने अधिकारों की जानकारी हासिल करने के लिए लंबा इंतजार नहीं करना चाहिए। शुरुआती समय में उचित कानूनी सलाह मिलने से पीड़ित महिला आगे की कार्रवाई के संबंध में बेहतर निर्णय ले सकती है।
जस्टिस नागरत्ना ने पैरालीगल वालंटियर की भूमिका को भी महत्वपूर्ण बताया। उन्होंने कहा कि ऐसे वालंटियर कम समय की सूचना पर उपलब्ध होने चाहिए, ताकि जरूरतमंद महिलाओं तक समय पर सहायता पहुंचाई जा सके।
उन्होंने कानूनी सहायता की प्रभावशीलता का आकलन करने के लिए अध्ययन किए जाने की जरूरत भी बताई। उनके अनुसार केवल यह देखना पर्याप्त नहीं है कि कितने लोगों को कानूनी सहायता मिली, बल्कि यह भी देखा जाना चाहिए कि उस सहायता से वास्तविक परिणाम क्या सामने आए।
राष्ट्रीय कानूनी सेवा प्राधिकरण के आंकड़ों का हवाला देते हुए जस्टिस नागरत्ना ने बताया कि अप्रैल 2025 से मार्च 2026 के बीच 4,14,795 महिलाओं ने कानूनी सहायता प्राप्त की। उन्होंने इस आंकड़े को सराहनीय बताया।












