नई दिल्ली: पश्चिम एशिया में लगातार गहराते भू-राजनीतिक संकट और उसके वैश्विक अर्थव्यवस्था पर पड़ रहे प्रभावों के बीच प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने शनिवार को आर्थिक सलाहकार परिषद (EAC-PM) के सदस्यों के साथ महत्वपूर्ण बैठक की। इस दौरान संकट के भारत पर संभावित प्रभावों का विस्तृत आकलन किया गया और उससे निपटने के लिए तात्कालिक तथा दीर्घकालिक रणनीतियों पर चर्चा हुई।
बैठक में विशेष रूप से कच्चे तेल और प्राकृतिक गैस की आपूर्ति, रुपये की स्थिति, विदेशी निवेश, व्यापारिक गतिविधियों और आम नागरिकों पर पड़ने वाले प्रभावों की समीक्षा की गई। प्रधानमंत्री मोदी ने स्पष्ट कहा कि सरकार की प्राथमिकता यह सुनिश्चित करना है कि वैश्विक संकट का असर आम जनता के जीवन और देश की आर्थिक गतिविधियों पर न्यूनतम रहे।
सूत्रों के अनुसार आर्थिक सलाहकार परिषद के सदस्यों ने प्रधानमंत्री के समक्ष विस्तृत प्रस्तुति दी, जिसमें पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव के कारण वैश्विक ऊर्जा बाजार, अंतरराष्ट्रीय व्यापार मार्गों और वित्तीय बाजारों पर पड़ रहे प्रभावों का विश्लेषण किया गया। विशेषज्ञों ने चेतावनी दी कि यदि क्षेत्र में तनाव लंबे समय तक बना रहता है तो इसका असर कच्चे तेल की कीमतों, शिपिंग लागत और वैश्विक मुद्रास्फीति पर पड़ सकता है।
बैठक में डॉलर के मुकाबले रुपये की स्थिति पर भी विस्तार से चर्चा हुई। हाल के दिनों में वैश्विक अनिश्चितताओं के कारण भारतीय मुद्रा पर दबाव बढ़ा था। हालांकि भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) द्वारा उठाए गए विभिन्न कदमों के बाद रुपये में कुछ मजबूती देखने को मिली है। आर्थिक सलाहकारों ने प्रधानमंत्री को बताया कि विदेशी निवेश को आकर्षित करने और मुद्रा बाजार में स्थिरता बनाए रखने के लिए लगातार निगरानी जरूरी है।
ऊर्जा सुरक्षा बैठक का सबसे महत्वपूर्ण विषय रही। विशेषज्ञों ने सुझाव दिया कि भारत को अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए किसी एक क्षेत्र या सीमित देशों पर निर्भर रहने के बजाय आपूर्ति स्रोतों का दायरा और बढ़ाना चाहिए। कच्चे तेल और गैस आयात के लिए नए देशों के साथ सहयोग बढ़ाने तथा वैकल्पिक आपूर्ति चैनल विकसित करने पर जोर दिया गया।
बैठक में यह भी कहा गया कि भारत को ऊर्जा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता की दिशा में प्रयास और तेज करने होंगे। इसके तहत सौर ऊर्जा, जलविद्युत, परमाणु ऊर्जा, एथेनॉल मिश्रण कार्यक्रम और हरित हाइड्रोजन मिशन को और अधिक गति देने की आवश्यकता बताई गई। विशेषज्ञों का मानना है कि भविष्य में ऊर्जा आयात पर निर्भरता कम करने का यही सबसे प्रभावी तरीका होगा।
प्रधानमंत्री मोदी ने विभिन्न आर्थिक क्षेत्रों पर संकट के संभावित प्रभावों का अलग-अलग विश्लेषण तैयार करने का निर्देश दिया। उन्होंने कहा कि उद्योग, कृषि, परिवहन, निर्यात और ऊर्जा जैसे क्षेत्रों की जरूरतों को ध्यान में रखते हुए समय रहते आवश्यक कदम उठाए जाने चाहिए। साथ ही उन्होंने संकेत दिया कि यदि जरूरत पड़ी तो सरकार आवश्यक आर्थिक और नीतिगत सुधारों को लागू करने के लिए पूरी तरह तैयार है।
बैठक के दौरान कारोबार को सुगम बनाने, निवेश बढ़ाने और आपूर्ति श्रृंखला को मजबूत करने के उपायों पर भी चर्चा हुई। प्रधानमंत्री ने कहा कि वैश्विक चुनौतियों के बावजूद भारत की आर्थिक गति को बनाए रखना और निवेशकों का विश्वास मजबूत रखना बेहद जरूरी है।
विशेषज्ञों का मानना है कि पश्चिम एशिया में जारी तनाव भारत के लिए ऊर्जा और व्यापार दोनों मोर्चों पर चुनौती बन सकता है, क्योंकि भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों का बड़ा हिस्सा आयात करता है। ऐसे में सरकार का सक्रिय रुख और समय पर नीति निर्माण देश को संभावित आर्थिक झटकों से बचाने में अहम भूमिका निभा सकता है।
प्रधानमंत्री मोदी ने बैठक के अंत में दोहराया कि सरकार की सर्वोच्च प्राथमिकता देश के नागरिकों के हितों की रक्षा करना है। उन्होंने कहा कि वैश्विक संकट चाहे कितना भी गंभीर क्यों न हो, सरकार यह सुनिश्चित करने के लिए हरसंभव कदम उठाएगी कि आम लोगों पर उसका प्रभाव कम से कम पड़े और देश की विकास यात्रा बाधित न हो।











