नई दिल्ली, दिल्ली
‘एक राष्ट्र, एक चुनाव' को लेकर बनी संयुक्त संसदीय समिति (जेपीसी) और सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीशों के बीच प्रस्तावित बैठक रद कर दी गई है। बैठक में प्रस्तावित संविधान संशोधन से जुड़े संवैधानिक और कानूनी पहलुओं पर अनौपचारिक चर्चा की जानी थी। शुरुआत में बैठक के लिए सहमति मिलने के बाद इसे रद किए जाने से इस मुद्दे पर चर्चा तेज हो गई है।
जेपीसी अध्यक्ष पी.पी. चौधरी के मुताबिक, सुप्रीम कोर्ट ने शुरुआत में अनौपचारिक बैठक के लिए सहमति दी थी। सितंबर के अंत में संसद सचिवालय के माध्यम से समिति को इसकी पुष्टि भी प्राप्त हुई थी। हालांकि, बाद में प्रस्तावित संविधान संशोधन के भविष्य में सुप्रीम कोर्ट के समक्ष न्यायिक समीक्षा का विषय बनने की संभावना को लेकर सवाल उठे।
इसके बाद यह महसूस किया गया कि जिस संवैधानिक विषय की आगे न्यायिक समीक्षा हो सकती है, उस पर न्यायाधीशों के साथ प्रशासनिक स्तर पर चर्चा करना उचित नहीं होगा। इसी आधार पर बैठक को रद कर दिया गया।
इस बैठक का प्रस्ताव द्रमुक सांसद पी. विल्सन की ओर से रखा गया था। उन्होंने बैठक रद होने पर निराशा व्यक्त की। उनके अनुसार, यह बैठक ‘एक राष्ट्र, एक चुनाव' के महत्वपूर्ण संवैधानिक पहलुओं पर चर्चा के लिए उपयोगी अवसर हो सकती थी।
वहीं, जेपीसी अध्यक्ष पी.पी. चौधरी ने न्यायाधीशों से परामर्श लेने की पहल का बचाव किया। उन्होंने कहा कि संवैधानिक मामलों पर संसदीय समितियों और न्यायाधीशों के बीच बातचीत के पुराने उदाहरण मौजूद हैं। उनके अनुसार, इस तरह की बातचीत का उद्देश्य न्यायपालिका की विशेषज्ञता को समझना था, न कि किसी न्यायिक प्रक्रिया को प्रभावित करना।
हालांकि, सुप्रीम कोर्ट के निर्णय के बाद समिति ने बैठक को आगे नहीं बढ़ाने का फैसला किया है। इससे अब जेपीसी को इस विषय पर अन्य विशेषज्ञों और संबंधित पक्षों के विचारों पर अधिक निर्भर रहना होगा।
इसी बीच, ‘एक राष्ट्र, एक चुनाव' के आर्थिक प्रभावों को लेकर भी जेपीसी के सामने महत्वपूर्ण विचार रखे गए। एक अन्य बैठक में मुख्य आर्थिक सलाहकार वी. अनंत नागेश्वरन, एस. महेंद्र देव और एस. गुरुमूर्ति सहित कई अर्थशास्त्रियों ने एक साथ चुनाव कराने का समर्थन किया।
अर्थशास्त्रियों ने समिति के सामने तर्क दिया कि बार-बार होने वाले चुनावों के कारण सरकारी वित्तीय आवंटन प्रभावित होता है। उनका कहना था कि लगातार चुनावी प्रक्रिया के कारण पूंजीगत व्यय के बजाय राजस्व व्यय पर अधिक ध्यान केंद्रित हो जाता है।
इस मुद्दे पर अब राजनीतिक और आर्थिक दोनों स्तरों पर चर्चा जारी है। वहीं, सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीशों के साथ प्रस्तावित बैठक रद होने के बाद इसके संवैधानिक पक्ष को लेकर बहस और महत्वपूर्ण हो गई है।











