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‘मां के कहने पर लगाया था आरोप’, DNA रिपोर्ट ने बदली पूरी कहानी; MP हाई कोर्ट ने रेप आरोपी को किया बरी

जबलपुर, मध्य प्रदेश

मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने दुष्कर्म के एक मामले में महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए आरोपी को बरी कर दिया है। अदालत ने डीएनए जांच रिपोर्ट को मामले में निर्णायक वैज्ञानिक साक्ष्यों में से एक माना। जांच में सामने आया कि पीड़िता से जन्मे नवजात बच्चे का जैविक पिता वह व्यक्ति नहीं था, जिसे निचली अदालत ने दुष्कर्म का दोषी ठहराया था।

यह मामला सिवनी जिले का है। सिवनी सेशंस कोर्ट ने आरोपी को दुष्कर्म के मामले में 10 साल की कठोर कैद की सजा सुनाई थी। इसके खिलाफ आरोपी ने हाई कोर्ट में अपील की थी।

मामले की सुनवाई के दौरान डीएनए रिपोर्ट अदालत के सामने रखी गई। रिपोर्ट में आरोपी और नवजात बच्चे के बीच जैविक पितृत्व नहीं पाया गया। इस वैज्ञानिक साक्ष्य को ध्यान में रखते हुए हाई कोर्ट ने निचली अदालत के फैसले की समीक्षा की।

वैज्ञानिक रिपोर्ट को माना अधिक विश्वसनीय

न्यायमूर्ति देवनारायण मिश्रा ने 17 सितंबर को दिए फैसले में कहा कि मामले में उपलब्ध वैज्ञानिक रिपोर्ट पीड़िता और अन्य गवाहों के बयानों की तुलना में अधिक विश्वसनीय प्रतीत होती है।

अदालत के इस निष्कर्ष के बाद सिवनी सेशंस कोर्ट द्वारा आरोपी को दी गई 10 साल की कठोर कैद की सजा रद्द कर दी गई। हाई कोर्ट ने आरोपी को बरी करने का आदेश दिया।

मामले में यह दावा भी किया गया था कि पीड़िता की मां के कहने पर आरोपी के खिलाफ आरोप लगाया गया था। हालांकि, हाई कोर्ट ने अपने फैसले में उपलब्ध साक्ष्यों का मूल्यांकन करते हुए विशेष रूप से डीएनए रिपोर्ट को महत्व दिया।

वैज्ञानिक साक्ष्य की अहम भूमिका

आपराधिक मामलों में डीएनए जांच का इस्तेमाल किसी व्यक्ति और जैविक नमूने के बीच संबंध स्थापित करने के लिए किया जाता है। इस मामले में नवजात बच्चे के डीएनए और आरोपी के जैविक संबंध की जांच की गई थी।

हाई कोर्ट के फैसले से स्पष्ट होता है कि अदालत किसी मामले में उपलब्ध साक्ष्यों की विश्वसनीयता और उनकी आपसी संगति को ध्यान में रखकर निष्कर्ष पर पहुंचती है। यहां वैज्ञानिक रिपोर्ट और अन्य मौखिक साक्ष्यों के बीच विरोधाभास को देखते हुए अदालत ने डीएनए रिपोर्ट को अधिक भरोसेमंद माना।

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