नई दिल्ली, दिल्ली। मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) को लेकर जारी विवाद के बीच भारत निर्वाचन आयोग ने सुप्रीम कोर्ट में हलफनामा दाखिल कर अपनी स्थिति स्पष्ट की है। आयोग ने कहा कि SIR से संबंधित सभी प्रमुख फैसले तीनों चुनाव आयुक्तों की सर्वसम्मति से लिए गए हैं। साथ ही, आयोग ने फॉर्म छह में किसी भी तरह के संशोधन से इनकार करते हुए स्पष्ट किया कि SIR के दौरान लिया जाने वाला घोषणा-पत्र एक अलग दस्तावेज है।
आयोग ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार पर एकतरफा फैसले लेने के आरोपों को भी खारिज किया है। यह हलफनामा राकेश कुमार सिंह की याचिका के जवाब में दाखिल किया गया है। सुप्रीम कोर्ट मंगलवार को इस मामले की सुनवाई करेगा। इस विवाद से जुड़े विपक्षी नेताओं की याचिकाएं भी अदालत में लंबित हैं।
तीनों चुनाव आयुक्तों की सहमति से लिए गए फैसले
उप चुनाव आयुक्त प्रकाश येतुरु की ओर से दाखिल हलफनामे में कहा गया है कि SIR से संबंधित 24 जून 2025, 27 अक्टूबर 2025 और 14 मई 2026 के आदेश सर्वसम्मति से जारी किए गए थे। आयोग ने यह भी स्पष्ट किया कि हलफनामे को मुख्य चुनाव आयुक्त और दोनों चुनाव आयुक्तों की सहमति प्राप्त है।
आयोग के अनुसार, फाइलों पर विचार के दौरान अधिकारियों या चुनाव आयुक्तों की ओर से दर्ज किए गए नोट, सुझाव, सवाल और टिप्पणियों को अंतिम निर्णय नहीं माना जा सकता। निर्धारित प्रक्रिया के तहत फाइल पहले एक चुनाव आयुक्त, फिर दूसरे चुनाव आयुक्त और अंत में मुख्य चुनाव आयुक्त के पास भेजी जाती है।
आयोग ने मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति, सेवा शर्तों तथा कार्यकाल से संबंधित वर्ष 2023 के कानून की धारा 18 का हवाला देते हुए कहा कि फैसले वैधानिक प्रक्रिया के तहत लिए गए हैं। इस प्रावधान के अनुसार, जहां तक संभव हो, निर्णय सर्वसम्मति से किए जाने चाहिए। सहमति नहीं बनने की स्थिति में बहुमत के आधार पर फैसला लिया जा सकता है।
फॉर्म छह और घोषणा-पत्र को लेकर क्या कहा?
चुनाव आयोग ने स्पष्ट किया कि मतदाता पंजीकरण नियम, 1960 के तहत निर्धारित फॉर्म में संशोधन करने का अधिकार केंद्र सरकार के पास है। SIR प्रक्रिया के दौरान मतदाताओं से लिया जाने वाला घोषणा-पत्र फॉर्म छह से अलग है। इसका उद्देश्य आवेदक की जानकारी का पुराने मतदाता रिकॉर्ड से मिलान करना है।
आयोग ने माना कि ऑनलाइन आवेदन के दौरान घोषणा-पत्र प्रदर्शित करने के तरीके से फॉर्म छह में बदलाव होने का भ्रम पैदा हो सकता है। इस स्थिति को स्पष्ट करने के लिए 21 अक्टूबर 2026 से ऑनलाइन आवेदन प्रक्रिया में फॉर्म छह और SIR घोषणा-पत्र को अलग-अलग हिस्सों में प्रदर्शित करने की व्यवस्था का उल्लेख किया गया है।
मतदाताओं को व्यक्तिगत सुनवाई से मिलेगी राहत
हलफनामे में आयोग ने मतदाताओं के लिए अपनाई जाने वाली प्रक्रिया के बारे में भी जानकारी दी है। आयोग के मुताबिक, यदि किसी मतदाता का नाम पुराने रिकॉर्ड में नहीं मिलता है, तो सामान्य परिस्थितियों में उसे व्यक्तिगत सुनवाई के लिए उपस्थित होने की जरूरत नहीं होगी। बूथ लेवल अधिकारी (BLO) संबंधित मतदाता के घर जाकर आवश्यक दस्तावेज जुटाएंगे और उन्हें ईसीआईनेट प्लेटफॉर्म पर अपलोड करेंगे।
आयोग ने कहा कि व्यक्तिगत सुनवाई असाधारण परिस्थितियों में ही होगी। मतदाता सूची में किसी का नाम जोड़ने या हटाने के लिए सक्षम निर्वाचक रजिस्ट्रीकरण अधिकारी (ERO) का आदेश अनिवार्य होगा।
इसके अलावा, ईसीआईनेट प्लेटफॉर्म की कार्यप्रणाली की समीक्षा के लिए आईआईटी मद्रास और भारतीय विज्ञान संस्थान, बेंगलुरु के विशेषज्ञों की एक समिति गठित किए जाने की जानकारी भी दी गई है।
मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने की मांग पर आयोग की दलील
मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को पद से हटाने की मांग के संबंध में आयोग ने संविधान के अनुच्छेद 324(5) का हवाला दिया। इसके तहत मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने की प्रक्रिया सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश को हटाने की प्रक्रिया के समान है।
आयोग ने कहा कि SIR से संबंधित फैसलों पर एकतरफा निर्णय लेने के आरोप निराधार हैं। विवाद एक अंग्रेजी दैनिक में प्रकाशित रिपोर्ट के बाद सामने आया था। रिपोर्ट में दावा किया गया था कि SIR से जुड़े 14 फैसले अन्य चुनाव आयुक्तों की आपत्तियों के बावजूद लिए गए।
आयोग ने इन आरोपों को खारिज करते हुए कहा कि याचिका अखबार की रिपोर्ट पर आधारित है और उसमें लगाए गए आरोपों की स्वतंत्र रूप से पुष्टि नहीं की गई है। आयोग ने यह भी स्पष्ट किया कि उसने किसी आंतरिक नोट या फाइल को मीडिया के साथ साझा करने की अनुमति नहीं दी थी।
इन दलीलों के आधार पर निर्वाचन आयोग ने सुप्रीम कोर्ट से याचिका खारिज करने का अनुरोध किया है। अब मामले में अदालत की सुनवाई और उसके रुख पर नजर रहेगी।











