नई दिल्ली, दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश अभय ओका ने चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति को राजनीतिक प्रभाव से मुक्त रखने के लिए एक मजबूत कानूनी ढांचा बनाने की मांग की है। उन्होंने कहा कि लोकतंत्र की रक्षा के लिए स्वतंत्र संवैधानिक संस्थाओं का होना बेहद जरूरी है। इसके साथ ही उन्होंने संवैधानिक पदों पर नियुक्तियों में जवाबदेही सुनिश्चित करने के लिए मौजूदा सुरक्षा उपायों पर भी सवाल उठाए।
चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति प्रक्रिया पर उठाए सवाल
सेवानिवृत्त न्यायमूर्ति अभय ओका रविवार को महाराष्ट्र के ठाणे में आयोजित एक व्याख्यान में बोल रहे थे। यह व्याख्यान अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और उससे जुड़े मुद्दों पर केंद्रित था। इस दौरान उन्होंने चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति प्रक्रिया को अधिक स्वतंत्र और निष्पक्ष बनाने की आवश्यकता पर जोर दिया।
जस्टिस ओका के मुताबिक, लोकतांत्रिक व्यवस्था में चुनाव आयोग जैसी संस्थाओं की स्वतंत्रता महत्वपूर्ण है। चुनाव प्रक्रिया पर लोगों का भरोसा बनाए रखने के लिए जरूरी है कि संवैधानिक पदों पर नियुक्तियां राजनीतिक प्रभाव से मुक्त और पारदर्शी तरीके से हों।
‘सत्ता पर निगरानी कौन रखता है?’
अभय ओका ने संवैधानिक नियुक्तियों में जवाबदेही और संस्थागत स्वतंत्रता से जुड़े सवाल उठाए। उनके विचारों का मुख्य केंद्र यह था कि सत्ता के इस्तेमाल पर निगरानी रखने और स्वतंत्र संस्थाओं की निष्पक्षता सुनिश्चित करने के लिए प्रभावी सुरक्षा उपाय होने चाहिए।
उन्होंने चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति के लिए ऐसे कानूनी प्रावधानों की जरूरत बताई, जो चयन प्रक्रिया की स्वतंत्रता को मजबूत कर सकें और राजनीतिक हस्तक्षेप की आशंकाओं को कम करें।
लोकतंत्र के लिए स्वतंत्र संस्थाएं जरूरी
लोकतंत्र में चुनाव आयोग की भूमिका महत्वपूर्ण होती है, क्योंकि चुनाव की निष्पक्षता और विश्वसनीयता का सीधा संबंध लोकतांत्रिक व्यवस्था में जनता के विश्वास से है। ऐसे में चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति प्रक्रिया में पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित करना आवश्यक माना जाता है।
जस्टिस ओका की मांग संवैधानिक संस्थाओं की स्वतंत्रता और नियुक्ति प्रक्रिया में सुरक्षा उपायों को लेकर व्यापक बहस को सामने लाती है। हालांकि, उपलब्ध जानकारी में उनके प्रस्तावित कानूनी ढांचे के विस्तृत प्रावधानों का उल्लेख नहीं है।











