कन्नौज, उत्तर प्रदेश
कन्नौज में दूध की बढ़ती खपत और उत्पादन के बीच बड़ा अंतर मिलावटखोरी को लेकर चिंता बढ़ा रहा है। जिले में रोजाना करीब आठ लाख लीटर दूध के उत्पादन के मुकाबले खपत 16 लाख लीटर से अधिक बताई जा रही है। ऐसे में दूध की मांग पूरी करने के लिए बड़े पैमाने पर मिलावट किए जाने की बात सामने आई है।
आरोप है कि कुछ दूध विक्रेता पशुपालकों से भैंस का दूध खरीदने के बाद उसमें पानी और अन्य रसायन मिलाते हैं। इसके बाद इसी दूध को गाय का दूध बताकर ग्राहकों के घर तक पहुंचाया जाता है। सबसे ज्यादा मिलावट गाय के दूध के नाम पर किए जाने की बात कही जा रही है।
जिले में उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक करीब 1,12,197 देशी गाय, 30,643 क्रॉसब्रीड गाय और 2,63,641 भैंस हैं। इसके बावजूद दूध की दैनिक खपत उत्पादन से लगभग दोगुनी है। यही अंतर मिलावटखोरी के लिए बड़ा बाजार तैयार करता है।
भैंस का दूध खरीदकर बढ़ाई जाती है मात्रा
बताया जा रहा है कि पशुपालकों से भैंस का दूध लगभग 70 रुपये प्रति लीटर और गाय का दूध करीब 40 रुपये प्रति लीटर की दर से खरीदा जाता है। इसके बाद कुछ दूधिए दूध में पानी और अन्य पदार्थ मिलाकर मात्रा बढ़ाते हैं और उसे अधिक कीमत पर बेचते हैं।
गाय के दूध के नाम पर बिक्री के लिए भैंस के दूध की बनावट बदलने की कोशिश किए जाने की भी बात कही जा रही है। हालांकि, यूरिया या किसी अन्य रसायन की वास्तविक मिलावट की पुष्टि केवल अधिकृत प्रयोगशाला जांच से ही हो सकती है।
सेहत के लिए कितना खतरनाक?
दूध में पानी मिलाने से उसकी पौष्टिकता और गुणवत्ता कम हो जाती है। यदि इसमें यूरिया या अन्य गैर-खाद्य रसायन मिलाए जाएं तो स्वास्थ्य के लिए खतरा और गंभीर हो सकता है। ऐसे पदार्थ खाद्य उपयोग के लिए नहीं होते और इनके सेवन से शरीर पर प्रतिकूल असर पड़ सकता है।
मिलावटी दूध की सबसे बड़ी समस्या यह है कि आम उपभोक्ता अक्सर इसे देखकर पहचान नहीं पाता। दूध का रंग या स्वाद सामान्य दिखाई देने के बावजूद उसमें मिलावट हो सकती है।
जांच और कार्रवाई जरूरी
दूध की गुणवत्ता सुनिश्चित करने के लिए खाद्य सुरक्षा विभाग द्वारा नियमित सैंपलिंग और प्रयोगशाला जांच जरूरी है। मिलावट की पुष्टि होने पर संबंधित लोगों के खिलाफ नियमानुसार कार्रवाई भी की जानी चाहिए।
दूध की खपत और उत्पादन के बीच अंतर को देखते हुए आपूर्ति व्यवस्था को मजबूत करने के साथ-साथ दूध की बिक्री और संग्रहण केंद्रों पर निगरानी बढ़ाना भी जरूरी है। इससे उपभोक्ताओं तक सुरक्षित और गुणवत्तापूर्ण दूध पहुंचाने में मदद मिल सकती है।











