नई दिल्ली, दिल्ली। राजधानी दिल्ली में वायु प्रदूषण से निपटने के लिए पानी का छिड़काव, एंटी-स्मॉग गन और मशीनों से सड़कों की सफाई जैसे उपाय किए जा रहे हैं। इसके बावजूद सड़कों के किनारे जमा धूल, निर्माण कार्यों से उड़ने वाले कण और खराब सड़कों की समस्या बनी हुई है। प्रदूषण के प्रमुख केंद्रों (हॉटस्पॉट) पर लगातार प्रयासों के बावजूद अपेक्षित सुधार नहीं होने से सरकारी एजेंसियों की कार्यप्रणाली पर सवाल उठ रहे हैं।
दिल्ली में धूल प्रदूषण का मुख्य कारण केवल सड़कों पर जमा मिट्टी नहीं है। निर्माण स्थलों पर नियमों का उल्लंघन, खुले में रखी निर्माण सामग्री, गड्ढे, कच्ची सड़कें और अवैध रूप से कचरा फेंकने जैसी समस्याएं भी वायु गुणवत्ता को प्रभावित करती हैं। ऐसे में विशेषज्ञों के सामने सबसे बड़ी चुनौती धूल को हवा में फैलने से पहले रोकने की है।
दिल्ली के इन इलाकों में प्रदूषण की समस्या गंभीर
दिल्ली के कई इलाके लंबे समय से प्रदूषण के हॉटस्पॉट के रूप में चिह्नित किए गए हैं। इनमें आनंद विहार, बवाना, मुंडका, वजीरपुर, रोहिणी, आरके पुरम, ओखला, जहांगीरपुरी, पंजाबी बाग, अशोक विहार और द्वारका शामिल हैं।
इसके अलावा आईटीओ, आईजीआई एयरपोर्ट, पूसा, अलीपुर, बुराड़ी क्रॉसिंग, नॉर्थ कैंपस और आईआईटी दिल्ली तथा जेएनयू के आसपास के क्षेत्रों में भी प्रदूषण के स्रोतों पर ध्यान दिया जा रहा है।
अक्टूबर 2026 में लोक निर्माण विभाग (PWD) ने 47 प्रदूषण हॉटस्पॉट के तीन किलोमीटर के दायरे में धूल के स्रोतों की पहचान कर उन्हें नियंत्रित करने की रणनीति पेश की। इसका उद्देश्य केवल मुख्य सड़क की सफाई करना नहीं, बल्कि आसपास के निर्माण स्थलों, खुली मिट्टी और अन्य प्रदूषणकारी गतिविधियों पर भी कार्रवाई करना है।
200 एंटी-स्मॉग गन लगाने की योजना
धूल को नियंत्रित करने के लिए दिल्ली में एंटी-स्मॉग गन और वॉटर स्प्रिंकलर का इस्तेमाल बढ़ाया जा रहा है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, दिल्ली नगर निगम (MCD) ने सड़कों, सार्वजनिक सुविधाओं और ऊंची इमारतों के आसपास 167 वॉटर स्प्रिंकलर और 60 एंटी-स्मॉग गन तैनात की थीं।
इसके अलावा, सभी 12 जोन में धूल से प्रभावित सड़कों की गहन सफाई का काम भी शुरू किया गया। विभाग की योजना लगभग 200 एंटी-स्मॉग गन लगाने की भी है।
हालांकि, इन उपायों की प्रभावशीलता को लेकर सवाल बने हुए हैं। एंटी-स्मॉग गन और पानी का छिड़काव हवा में उड़ने वाली धूल को कुछ हद तक दबा सकते हैं, लेकिन खराब सड़कों की मरम्मत, निर्माण सामग्री को ढकने और कचरे का उचित निपटान करने का विकल्प नहीं हैं।
मशीनों से सफाई में भी बड़ी कमी
दिल्ली में सड़क की धूल को नियंत्रित करने के लिए मैकेनिकल रोड स्वीपर का इस्तेमाल किया जाता है। इन मशीनों का उद्देश्य सड़कों पर जमा धूल को हटाना है, ताकि वाहनों की आवाजाही से वह दोबारा हवा में न फैले।
23 अक्टूबर 2026 को प्रकाशित एक रिपोर्ट के अनुसार, दिल्ली की बड़ी और मध्यम आकार की सड़कों पर ये मशीनें हर दूसरे दिन केवल 35 से 40 प्रतिशत हिस्से की सफाई कर पा रही थीं। शहर में लगभग 100 मशीनें उपलब्ध थीं, जबकि जरूरत 172 मशीनों की बताई गई।
आकलन में यह भी सामने आया कि एक मशीन प्रतिदिन लगभग 30 किलोमीटर सड़क की सफाई कर रही थी, जबकि निर्धारित लक्ष्य 40 किलोमीटर था। सड़कों पर अतिक्रमण और अवैध रूप से खड़े वाहनों के कारण भी सफाई कार्य प्रभावित होता है।
इसके अलावा, दिल्ली के सड़क नेटवर्क का लगभग 70 प्रतिशत हिस्सा 10 मीटर से कम चौड़ाई वाली सड़कों का है। इन सड़कों की सफाई अब भी काफी हद तक मैन्युअल तरीके से की जाती है। इससे स्पष्ट होता है कि केवल मशीनों की संख्या बढ़ाना पर्याप्त नहीं है, बल्कि उनकी पहुंच और नियमित उपयोग सुनिश्चित करना भी जरूरी है।
निर्माण कार्य और कचरा बन रहे प्रदूषण के बड़े स्रोत
निर्माण और तोड़फोड़ के दौरान निकलने वाली धूल भी दिल्ली की वायु गुणवत्ता के लिए बड़ी चुनौती है। निर्माण स्थलों पर सामग्री को खुला छोड़ना, मलबे का गलत तरीके से भंडारण करना और निर्माण कचरे को सड़कों या खाली प्लॉटों पर फेंकना समस्या को बढ़ाता है।
मार्च 2026 की एक रिपोर्ट के अनुसार, प्रधानमंत्री कार्यालय ने दिल्ली में धूल नियंत्रण के उपायों में कमियों पर चिंता जताई थी। इस दौरान सड़कों पर जमा धूल, कचरा प्रबंधन और शिकायतों के समाधान में देरी जैसे मुद्दे उठाए गए थे।
अक्टूबर 2026 में एमसीडी ने निर्माण और विध्वंस कचरे से जुड़े सभी 125 स्थलों पर 360 डिग्री कैमरों के माध्यम से निगरानी बढ़ाई। इन कैमरों की लाइव फीड दिल्ली प्रदूषण नियंत्रण समिति को भेजने की व्यवस्था की गई। इसके साथ ही निर्माण कचरे को ढकने, धूल रोकने के लिए बैरियर लगाने और मलबा ले जाने वाले वाहनों को पूरी तरह ढकने जैसे नियमों पर भी जोर दिया गया।
4,555 छोटे स्रोतों की हुई थी पहचान
कमीशन फॉर एयर क्वालिटी मैनेजमेंट (CAQM) की हॉटस्पॉट से संबंधित कवायद में प्रदूषण के छोटे स्रोतों की बड़ी संख्या सामने आई थी। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, अधिकारियों ने सड़क की धूल, गड्ढों, कच्ची सड़कों, अवैध रूप से फेंके गए निर्माण मलबे, ट्रैफिक जाम और खुले में कचरा जलाने सहित 4,555 छोटे स्रोतों की पहचान की थी।
इसके अलावा, पहले किए गए आकलन में 13 हॉटस्पॉट पर प्रदूषण के 65 प्रमुख स्रोत चिह्नित किए गए थे। इनमें से 16 समस्याओं का समाधान किया गया, जबकि 43 की निगरानी जारी थी और छह पर कार्रवाई होनी बाकी थी।
ये आंकड़े बताते हैं कि दिल्ली में प्रदूषण को नियंत्रित करने के लिए केवल बड़े अभियानों पर निर्भर रहना पर्याप्त नहीं है। स्थानीय स्तर पर छोटी-छोटी समस्याओं का समय पर समाधान करना भी उतना ही महत्वपूर्ण है।
धूल प्रदूषण रोकने के लिए क्या करना होगा?
दिल्ली में धूल प्रदूषण को स्थायी रूप से नियंत्रित करने के लिए सड़कों की नियमित सफाई के साथ-साथ गड्ढों की मरम्मत, सड़क किनारे जमा मिट्टी को हटाने और निर्माण स्थलों पर नियमों का सख्ती से पालन कराने की जरूरत है। कचरे को एक स्थान से दूसरे स्थान पर ले जाना ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि उसका उचित निपटान भी सुनिश्चित करना होगा।
इसके अलावा, प्रदूषण के हॉटस्पॉट के आसपास के इलाकों में भी निगरानी बढ़ानी होगी, क्योंकि वहां से उड़ने वाली धूल आसपास की सड़कों और रिहायशी क्षेत्रों तक पहुंच सकती है।
दिल्ली में धूल प्रदूषण के खिलाफ असली चुनौती उपकरणों की संख्या बढ़ाना नहीं, बल्कि प्रदूषण के स्रोतों पर प्रभावी कार्रवाई करना है। जब तक सड़कों का रखरखाव बेहतर नहीं होगा, निर्माण नियमों का उल्लंघन नहीं रुकेगा और कचरा प्रबंधन में सुधार नहीं आएगा, तब तक पानी के छिड़काव और एंटी-स्मॉग गन जैसे उपाय स्थायी राहत देने में सीमित ही रहेंगे।











