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साइबर ठगी पर सीधा प्रहार! DoT के FRI सिस्टम ने बचाए 5,043 करोड़ रुपये, ऐसे काम करता है सिस्टम

नई दिल्ली, दिल्ली

नई दिल्ली। ऑनलाइन बैंकिंग और डिजिटल भुगतान के बढ़ते इस्तेमाल के साथ साइबर अपराधियों के तरीके भी लगातार बदल रहे हैं। फर्जी KYC, बैंक अधिकारी बनकर फोन करना, UPI फ्रॉड और अन्य तरीकों से लोगों को निशाना बनाया जाता है। ऐसे मामलों में सबसे बड़ी समस्या यह होती है कि पैसा खाते से निकलने के बाद उसे तुरंत दूसरे खातों में भेज दिया जाता है।

इसी चुनौती से निपटने के लिए दूरसंचार विभाग ने Financial Fraud Risk Indicator यानी FRI विकसित किया है। DoT के अनुसार, अगस्त 2026 तक FRI की मदद से संभावित वित्तीय धोखाधड़ी में 5,043.73 करोड़ रुपये की हानि रोकने में मदद मिली है। FRI को 22 मई को लॉन्च किया गया था।

मोबाइल नंबर के जोखिम की पहचान

FRI किसी मोबाइल नंबर को वित्तीय धोखाधड़ी से जुड़े जोखिम के आधार पर वर्गीकृत करता है। इसमें नंबर को मीडियम, हाई और वेरी हाई रिस्क श्रेणी में रखा जाता है। यह जानकारी बैंकों, NBFC और UPI सेवा प्रदाताओं के लिए उपलब्ध कराई जाती है।

अगर किसी संदिग्ध मोबाइल नंबर से जुड़ा वित्तीय लेनदेन सामने आता है तो संबंधित संस्था अतिरिक्त सुरक्षा उपाय अपना सकती है। इनमें ग्राहक को अलर्ट भेजना, चेतावनी देना, लेनदेन में देरी करना या संदिग्ध ट्रांजेक्शन को रोकना शामिल है।

कहां से मिलती है जानकारी?

FRI के लिए कई स्रोतों से जानकारी जुटाई जाती है। इसमें Indian Coordination Centre (I4C) के Cybercrime Reporting Portal, DoT के Chakshu प्लेटफॉर्म और बैंकों तथा वित्तीय संस्थानों से प्राप्त खुफिया जानकारी शामिल होती है।

यह पूरी व्यवस्था Digital Intelligence Platform यानी DIP के माध्यम से काम करती है। DIP का उद्देश्य दूरसंचार संसाधनों के दुरुपयोग और उनसे जुड़े साइबर अपराधों को रोकने के लिए विभिन्न संस्थानों के बीच जानकारी साझा करना है।

ठगी के बाद नहीं, पहले कार्रवाई

FRI की खासियत यह है कि इसका जोर ठगी होने के बाद रकम की तलाश करने के बजाय संभावित धोखाधड़ी को पहले ही रोकने पर है। DoT के अनुसार, FRI के इस्तेमाल से वित्तीय संस्थानों द्वारा अलर्ट और ट्रांजेक्शन रोकने जैसे कदम उठाए गए हैं।

सरकार डिजिटल भुगतान व्यवस्था में इस तरह की रियल-टाइम सुरक्षा को और मजबूत करने पर जोर दे रही है।

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