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थलापति विजय को सरकार बनाने का न्योता नहीं दे रहे राज्यपाल, बिहार के मामले में SC ने क्या कहा था?

सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि राज्यपाल को सरकार बनाने के लिए सबसे बड़ी पार्टी या गठबंधन को आमंत्रित करना होता है, और वह बहुमत जुटाने के तरीके की जांच नहीं कर सकता।

चुनावों के बाद सरकार बनाने के लिए सबसे बड़ी पार्टी या चुनाव के बाद बने गठबंधन को आमंत्रित करने के अलावा राज्यपाल के पास कोई और विकल्प नहीं होता और वह इस बात की जांच नहीं कर सकता कि सबसे बड़ी पार्टी या गठबंधन ने बहुमत का समर्थन कैसे जुटाया है।

सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठों ने 1994 के ऐतिहासिक एस.आर. बोम्मई फैसले से लेकर 2006 के रामेश्वर प्रसाद फैसले तक लगातार यही व्यवस्था दी है।

फैसले में की गई यूपीए सरकार की कड़ी आलोचना

रामेश्वर प्रसाद फैसले में यूपीए सरकार की कड़ी आलोचना की गई थी। यह आलोचना बिहार विधानसभा को भंग करने और राष्ट्रपति शासन लगाने के लिए की गई थी। यह फैसला तत्कालीन राज्यपाल बूटा सिंह की उस रिपोर्ट पर आधारित था, जिसमें कहा गया था कि जेडीयू और बीजेपी के बीच चुनाव-पूर्व कोई गठबंधन नहीं था और उनका एक साथ आना विधायकों की खरीद-फरोख्त (हॉर्स-ट्रेडिंग) की बू देता था।

सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा था?

बोम्मई फैसले का हवाला देते हुए, 2006 के फैसले में बहुमत ने कहा था, “अगर ऐसे मनगढ़ंत अनुमानों के आधार पर किसी राजनीतिक पार्टी को चुनाव के बाद सरकार बनाने का दावा करने से रोकने वाले कदम को सही मान लिया जाए तो यह हमारे लोकतांत्रिक ताने-बाने को ही खत्म कर देगा।”

सुप्रीम कोर्ट ने कहा था, “अगर विधायकों के बहुमत का समर्थन रखने वाली पार्टी को सरकार बनाने का दावा करने से रोकने के लिए ‘हॉर्स-ट्रेडिंग’ (विधायकों की खरीद-फरोख्त) के मनगढ़ंत दावों को आधार बनाया जाता है तो ‘इसका इस्तेमाल चुनाव के बाद होने वाले गठबंधनों और नए गठबंधनों को अनैतिक बताकर खारिज करने के लिए भी किया जा सकता है, जिससे देश या राज्य को एक और चुनाव का सामना करना पड़ सकता है।'”

‘बहुमत तो सदन के पटल पर ही साबित करना होगा’

अदालत ने ने कहा था, “अगर चुनावों के बाद दो या ज्यादा पार्टियां एक साथ आती हैं तो ऐसी गैर-कानूनी बातों के आधार पर बहुमत के उनके दावे को नकारना मुश्किल हो सकता है। ये ऐसे पहलू हैं जिन्हें राजनीतिक पार्टियों पर छोड़ देना ही बेहतर है, जिन्हें बेशक अपने लिए अच्छे और नैतिक मानक तय करने चाहिए, लेकिन किसी भी हाल में आखिरी फैसला मतदाताओं और विधायिका पर ही छोड़ना होगा, जिसमें विपक्ष के सदस्य भी शामिल होते हैं।”

सरकार बनाने का दावा करने वाली पार्टी या गठबंधन को जिस ‘फ्लोर टेस्ट’ (बहुमत परीक्षण) का सामना करना होता है, उस पर जोर देते हुए सुप्रीम कोर्ट ने बिहार में राष्ट्रपति शासन को रद्द कर दिया था और कहा था, “अंततः बहुमत सदन के पटल पर ही साबित करना होगा।”

बोम्मई मामले में एक बेंच ने चुनी हुई सरकारों को बर्खास्त करने या विधिवत चुनी हुई विधानसभा को भंग करने के लिए राज्यपाल की शक्तियों के दुरुपयोग के प्रति आगाह किया था और कहा था, “इस शक्ति की विशालता ही—जिसके द्वारा विधिवत गठित सरकार को बर्खास्त करके और विधिवत चुनी हुई विधानसभा को भंग करके किसी राज्य की जनता की इच्छा को निरस्त कर दिया जाता है—इसके बार-बार उपयोग या दुरुपयोग (जैसा भी मामला हो) के विरुद्ध एक चेतावनी का काम करना चाहिए। इस शक्ति के हर दुरुपयोग के अपने परिणाम होते हैं, जो शायद तुरंत स्पष्ट न हों, लेकिन कुछ वर्षों बाद एक विकराल रूप में सामने आते हैं।”

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