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मंदिरों के पुजारियों की आर्थिक सुरक्षा पर सुप्रीम कोर्ट में आज सुनवाई, सम्मानजनक वेतन की उठी मांग

देशभर के सरकारी नियंत्रण वाले मंदिरों में कार्यरत पुजारियों, सेवादारों और कर्मचारियों की आर्थिक स्थिति को लेकर दायर जनहित याचिका पर आज सुप्रीम कोर्ट में महत्वपूर्ण सुनवाई होने जा रही है। यह मामला उन हजारों मंदिर कर्मचारियों से जुड़ा है, जो वर्षों से बेहद कम आय और सीमित सुविधाओं के बीच जीवन बिताने को मजबूर हैं।

सुप्रीम कोर्ट की जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ इस मामले की सुनवाई करेगी। याचिका भाजपा नेता और अधिवक्ता अश्विनी उपाध्याय की ओर से दाखिल की गई है, जिसमें केंद्र और राज्य सरकारों को मंदिर कर्मचारियों के वेतन, भत्तों और सामाजिक सुरक्षा सुविधाओं की समीक्षा के लिए एक न्यायिक आयोग या विशेषज्ञ समिति गठित करने का निर्देश देने की मांग की गई है।

पुजारियों की आर्थिक स्थिति पर उठे गंभीर सवाल

याचिका में कहा गया है कि देश के कई राज्यों में मंदिरों का प्रशासनिक और आर्थिक नियंत्रण सरकारों के हाथ में है। ऐसे में वहां कार्यरत पुजारियों और कर्मचारियों के साथ सरकार का नियोक्ता-कर्मचारी जैसा संबंध बनता है। इसके बावजूद उन्हें सम्मानजनक वेतन, पेंशन, चिकित्सा सुविधा और अन्य मूलभूत लाभ नहीं मिल रहे हैं।

याचिकाकर्ता का कहना है कि यह स्थिति संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत मिलने वाले गरिमापूर्ण जीवन और आजीविका के अधिकार का उल्लंघन है। याचिका में आरोप लगाया गया है कि मंदिरों से करोड़ों रुपये की आय होने के बावजूद वहां सेवा देने वाले पुजारियों को न्यूनतम मजदूरी के बराबर भी पारिश्रमिक नहीं मिल पाता।

दक्षिण भारत के राज्यों का दिया गया उदाहरण

याचिका में आंध्र प्रदेश, तेलंगाना और तमिलनाडु जैसे राज्यों का उल्लेख करते हुए दावा किया गया है कि सरकारी नियंत्रण वाले कई मंदिरों में पुजारियों की स्थिति बेहद दयनीय है। कई मंदिर कर्मचारी अपनी आजीविका के लिए ‘दक्षिणा’ पर निर्भर रहते हैं।

फरवरी 2025 में तमिलनाडु के एक मंदिर में आरती की थाली में दक्षिणा लेने पर रोक लगाए जाने का भी जिक्र किया गया है। याचिका के अनुसार, इस तरह के कदमों ने पहले से आर्थिक संकट झेल रहे पुजारियों की परेशानियां और बढ़ा दी हैं।

महंगाई के दौर में बढ़ी चिंता

लगातार बढ़ती महंगाई और सीमित आय के कारण मंदिर कर्मचारियों के सामने परिवार चलाने का संकट खड़ा हो गया है। कई पुजारियों का कहना है कि वर्षों तक धार्मिक सेवा देने के बावजूद उन्हें सामाजिक सुरक्षा, बीमा या पेंशन जैसी सुविधाएं नहीं मिलतीं।

याचिका में अदालत से मांग की गई है कि मंदिर कर्मचारियों के लिए न्यूनतम वेतन तय किया जाए और उन्हें सरकारी कर्मचारियों की तरह बुनियादी सुविधाएं उपलब्ध कराई जाएं। साथ ही यह भी कहा गया है कि मंदिर प्रशासन की आय का एक हिस्सा कर्मचारियों के कल्याण पर अनिवार्य रूप से खर्च किया जाए।

सुनवाई पर टिकी निगाहें

इस मामले की सुनवाई को लेकर मंदिर कर्मचारियों और धार्मिक संगठनों की नजरें सुप्रीम कोर्ट पर टिकी हुई हैं। माना जा रहा है कि अदालत की टिप्पणी और संभावित निर्देश भविष्य में मंदिर प्रशासन और कर्मचारियों की कार्यप्रणाली पर बड़ा असर डाल सकते हैं।

धार्मिक और सामाजिक संगठनों का कहना है कि जो लोग समाज को आध्यात्मिक मार्ग दिखाते हैं, उनके जीवन को सम्मानजनक बनाना भी सरकार और समाज की जिम्मेदारी है।

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