नई दिल्ली, दिल्ली
BRICS सम्मेलन के समापन सत्र में चीन के राष्ट्रपति शी चिनफिंग की ओर से एकीकृत बाजार और ओपन-सोर्स आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) प्लेटफॉर्म को लेकर दिए गए प्रस्ताव ने भारत का ध्यान खींचा है। चीन को अगले BRICS सम्मेलन की अध्यक्षता मिलने वाली है। ऐसे में माना जा रहा है कि बीजिंग इन प्रस्तावों को अगले साल समूह के प्रमुख एजेंडे में शामिल करने की कोशिश कर सकता है। हालांकि, भारतीय नीति निर्माता और विशेषज्ञ चीन की इन पहलों को लेकर सतर्क नजर आ रहे हैं।
चिंता मुख्य रूप से इस बात को लेकर है कि यदि BRICS देशों के बीच टैरिफ कम करके बाजारों को अधिक एकीकृत करने की दिशा में कदम उठाए जाते हैं, तो इसका भारतीय उद्योग पर असर पड़ सकता है। भारत को आशंका है कि पर्याप्त सुरक्षात्मक उपायों के अभाव में चीनी कंपनियों और उत्पादों की पहुंच भारतीय बाजार में तेजी से बढ़ सकती है। इससे घरेलू विनिर्माण और स्वदेशी तकनीक के विकास पर दबाव बढ़ने की संभावना है।
चीनी उत्पादों को लेकर भारत की सतर्कता
भारत ने पिछले वर्षों में चीनी निवेश और तकनीकी कंपनियों को लेकर सुरक्षा संबंधी जांच और निगरानी को प्राथमिकता दी है। उद्योग जगत की ओर से कारोबार आसान बनाने की मांग के बावजूद सरकार ने संवेदनशील क्षेत्रों में सुरक्षा संबंधी नियमों में व्यापक ढील नहीं दी है।
चीनी उत्पादों पर निर्भरता कम करने की चिंता केवल भारत तक सीमित नहीं है। अमेरिका, यूरोप और जापान समेत कई बड़ी अर्थव्यवस्थाएं भी रणनीतिक क्षेत्रों में चीन पर अपनी निर्भरता घटाने की कोशिश कर रही हैं।
RCEP से दूरी का उदाहरण
भारत का रुख क्षेत्रीय व्यापार समझौतों को लेकर पहले भी सावधानी भरा रहा है। नवंबर 2019 में भारत ने क्षेत्रीय व्यापक आर्थिक भागीदारी यानी RCEP समझौते से बाहर रहने का फैसला किया था। उस समय भारत की प्रमुख चिंताओं में चीन के साथ व्यापार असंतुलन और घरेलू बाजार में चीनी सामान की बढ़ती पहुंच शामिल थी।
अब BRICS के मंच पर एकीकृत बाजार और ओपन-सोर्स AI जैसे प्रस्तावों के बीच भारत के लिए चुनौती यह होगी कि आर्थिक सहयोग बढ़ाने के साथ घरेलू उद्योग, तकनीकी आत्मनिर्भरता और राष्ट्रीय सुरक्षा के हितों का संतुलन कैसे कायम रखा जाए। अगले BRICS सम्मेलन की चीन में अध्यक्षता के दौरान इन मुद्दों पर भारत की भूमिका पर खास नजर रहेगी।












