मुंबई, महाराष्ट्र
Jeevan Ya Bheema Con? Movie Review: अरशद वारसी की फिल्म हो और कॉमेडी की उम्मीद न हो, ऐसा मुश्किल है। ‘जीवन या भीमा कॉन?’ भी शुरुआत में यही उम्मीद जगाती है। कर्ज में डूबा एक पति, परेशान पत्नी, दो करोड़ रुपये की बीमा पॉलिसी और पति की हूबहू शक्ल वाला एक अजनबी—कहानी में एक मजेदार क्राइम-कॉमेडी के लिए जरूरी मसाला मौजूद है। लेकिन फिल्म जैसे-जैसे आगे बढ़ती है, शुरुआती उत्सुकता धीरे-धीरे थकान में बदलने लगती है।
फिल्म: जीवन या भीमा कॉन?
कलाकार: अरशद वारसी, संजीदा शेख, विजय राज, ब्रिजेंद्र काला, पूजा चोपड़ा, अतुल परचुरे और जयवंत वाडकर
लेखक: मुक्ता भट्ट, अभिषेक डोगरा और मेघव्रत सिंह गुर्जर
निर्देशक: अभिषेक डोगरा
निर्माता: अनशु मिश्रा
रिलीज डेट: 4 सितंबर 2026
रेटिंग: ⭐⭐ 2/5
कहानी
जीवन (अरशद वारसी) और योजना (संजीदा शेख) कर्ज में डूबे हुए हैं। जीवन ने नौकरी छोड़कर अपना रेस्टोरेंट शुरू किया था, लेकिन कारोबार नहीं चला और कर्ज लगातार बढ़ता गया।
इसी बीच जीवन की मुलाकात भीमा नाम के एक ऐसे शख्स से होती है, जो हूबहू उसी की तरह दिखता है। यहीं से जीवन के दिमाग में एक योजना आती है। कहानी में दो करोड़ रुपये की बीमा पॉलिसी अहम भूमिका निभाती है और योजना भी इस प्लान में उसका साथ देने लगती है।
लेकिन जिस काम को दोनों आसान समझ रहे होते हैं, मामला उतना सीधा नहीं रहता। विनायक (विजय राज) और उसका साथी मन्नू (ब्रिजेंद्र काला) कहानी में आते हैं और मामला अपराध की तरफ बढ़ने लगता है। बीमा और पैसों का खेल धीरे-धीरे कई किरदारों को अपने घेरे में ले लेता है।
फिल्म का शुरुआती सेटअप दिलचस्प है। लगता है कि आगे कहानी में खूब उलझन, गलतफहमी और कॉमेडी देखने को मिलेगी। लेकिन फिल्म इस संभावना को ज्यादा देर तक संभाल नहीं पाती और कहानी की रफ्तार धीरे-धीरे कमजोर पड़ने लगती है।
अभिनय
अरशद वारसी को पर्दे पर देखकर सबसे पहले यही महसूस होता है कि उन्हें कॉमेडी की टाइमिंग अच्छी तरह आती है। समस्या यह है कि फिल्म का लेखन उनका साथ नहीं देता।
डबल रोल में अरशद दोनों किरदारों को अलग अंदाज देने की कोशिश करते हैं। उनके हावभाव और कॉमिक टाइमिंग में अनुभव साफ नजर आता है, लेकिन उन्हें ऐसी परिस्थितियां और संवाद कम मिलते हैं, जहां उनकी प्रतिभा खुलकर सामने आ सके। कई जगह अभिनेता पूरी कोशिश करते दिखाई देते हैं, लेकिन कमजोर संवाद उस कोशिश का असर कम कर देते हैं।
संजीदा शेख योजना के किरदार में ठीक लगती हैं। वह भावनात्मक और कॉमेडी दोनों तरह के दृश्यों में अपनी तरफ से अच्छा करने की कोशिश करती हैं, लेकिन किरदार को जिस तरह लिखा गया है, उसमें उनके लिए बहुत ज्यादा गुंजाइश नहीं है।
विजय राज की एंट्री से उम्मीद बढ़ती है कि फिल्म अब कुछ बेहतर होगी। उनका अनुभव साफ दिखाई देता है, लेकिन विनायक के हिस्से में आए संवाद उतने प्रभावी नहीं हैं। ब्रिजेंद्र काला भी अपने अंदाज में कोशिश करते हैं, मगर कमजोर लेखन के कारण उनकी कॉमेडी पूरी तरह असर नहीं छोड़ पाती।
पूजा चोपड़ा मकान मालकिन के किरदार में हैं। उनका किरदार कहानी की जरूरत के हिसाब से आता है, कुछ घटनाओं को आगे बढ़ाता है और फिर फिल्म आगे निकल जाती है।
निर्देशन
अभिषेक डोगरा का निर्देशन फिल्म की कमजोर कड़ियों में शामिल है। फिल्म का बड़ा हिस्सा एक ही घर और कमरे के आसपास घूमता है। सीमित लोकेशन अपने आप में समस्या नहीं है, लेकिन इसके लिए मजबूत पटकथा और प्रभावी संवाद जरूरी होते हैं।
यहां कुछ समय बाद ऐसा महसूस होने लगता है कि किरदार एक-दूसरे के सामने बैठे हैं और बारी-बारी से दर्शकों को कहानी समझा रहे हैं।
दूसरे हिस्से में किरदारों और घटनाओं की संख्या बढ़ती है। हंगामा बढ़ता है, आवाजें बढ़ती हैं, लेकिन मनोरंजन उसी अनुपात में नहीं बढ़ता। कई दृश्यों में जबरदस्ती हंसाने की कोशिश दिखाई देती है।
कुछ जगह तो दृश्य शुरू होते ही अंदाजा लग जाता है कि अब कॉमेडी करने की कोशिश होगी। यही फिल्म की सबसे बड़ी समस्या बन जाती है—कॉमेडी स्वाभाविक तरीके से पैदा होने के बजाय लिखी हुई और थोपी हुई महसूस होती है।
एक दृश्य में अरशद का किरदार खुद कहता है कि ‘यह मजेदार है।’ विडंबना यह है कि जिस दृश्य को फिल्म मजेदार मानकर पेश करती है, उस पर दर्शक शायद ही हंसे। यही इस फिल्म की कॉमेडी का सबसे सटीक उदाहरण है।
पटकथा और लेखन
फिल्म की पटकथा की सबसे बड़ी परेशानी इसकी कसावट की कमी है। कई चीजें कहानी का स्वाभाविक हिस्सा कम और कहानी को आगे बढ़ाने का जरिया ज्यादा लगती हैं।
जहां कहानी अटकती है, वहां कोई नया किरदार या नई जानकारी जोड़ दी जाती है। योजना का नर्स होना इसका एक उदाहरण है। शुरुआत में लगता है कि यह जानकारी आगे कहानी में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी, लेकिन बाद में इसका इस्तेमाल सीमित रह जाता है।
मकान मालकिन का ट्रैक भी अचानक जुड़ता है। बीमा एजेंट का शक करना और पुलिस तक मामला पहुंचना भी कहानी को आगे ले जाने की कोशिश है। लेकिन तब तक फिल्म की रफ्तार इतनी धीमी हो चुकी होती है कि नए मोड़ भी दर्शकों में पहले जैसी उत्सुकता पैदा नहीं कर पाते।
पहले हिस्से में घटनाएं अपेक्षाकृत तेजी से आगे बढ़ती हैं। इंटरवल तक फिल्म उम्मीद बनाए रखती है कि दूसरा हिस्सा कहानी को एक मजेदार दिशा में ले जाएगा। लेकिन दूसरे भाग में फिल्म एक ही जगह घूमती हुई महसूस होती है।
इतने सारे किरदारों, गलतफहमियों और अपराध से जुड़े घटनाक्रम को संभालने के लिए जिस चुस्त पटकथा की जरूरत थी, वह फिल्म में नजर नहीं आती।
कुल मिलाकर
‘जीवन या भीमा कॉन?’ के पास एक अच्छा कॉमेडी-क्राइम कॉन्सेप्ट है। अरशद वारसी जैसा कलाकार है, विजय राज और ब्रिजेंद्र काला जैसे अनुभवी अभिनेता हैं और कहानी में बीमा, डबल रोल, अपराध और पैसों का खेल भी है। लेकिन इन सबको जोड़कर जिस मनोरंजक फिल्म की उम्मीद बनती है, फिल्म उस स्तर तक नहीं पहुंच पाती।
अरशद वारसी अपनी तरफ से फिल्म को संभालने की कोशिश करते हैं, लेकिन कमजोर संवाद, ढीली पटकथा और खिंचा हुआ दूसरा भाग उनका साथ नहीं देता।
अगर आप अरशद वारसी के प्रशंसक हैं तो फिल्म में उनके कुछ पल पसंद आ सकते हैं, लेकिन एक मजबूत और लगातार मनोरंजन देने वाली क्राइम-कॉमेडी की उम्मीद लेकर जा रहे हैं तो यह फिल्म निराश कर सकती है।
रेटिंग: 2/5











