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‘फिरे शिव के करनमा…’ में गूंजती है पार्वती की तपस्या, मैथिली लोकगीत में छिपी है त्याग और प्रेम की मार्मिक कथा

दरभंगा, बिहार

मिथिलांचल की लोक परंपरा में भगवान शिव और माता पार्वती के प्रेम तथा भक्ति का वर्णन बेहद भावनात्मक तरीके से किया जाता है। मैथिली लोकसंगीत की नचारी और महेशवाणी विधाओं में शिव-पार्वती से जुड़ी कई कथाएं लोकगीतों के रूप में पीढ़ियों से सुनाई और गाई जाती रही हैं। इन्हीं में एक मार्मिक लोकगीत है- ‘फिरे शिव के करनमा गौरी वन में वन में ना…’

यह गीत माता पार्वती की उस कठोर साधना को केंद्र में रखता है, जो उन्होंने भगवान शिव को पति रूप में पाने के लिए की थी। लोककथा के अनुसार, पार्वती ने महादेव को पाने के लिए कठिन तपस्या का मार्ग चुना। उन्होंने सांसारिक सुखों से दूरी बनाई और अपने संकल्प को पूरा करने के लिए कठोर साधना की।

वन-वन भटकने की कथा

लोकगीत की पंक्तियों में गौरी के वन-वन भटकने की छवि दिखाई देती है। इसके पीछे सिर्फ शिव को पाने की इच्छा नहीं, बल्कि गहरा त्याग और समर्पण बताया गया है। लोकमान्यता के अनुसार, पार्वती ने तपस्या के दौरान अन्न-जल तक का त्याग कर दिया था। बेलपत्र के सहारे जीवन बिताने की कथा भी इसी तपस्या से जुड़ी लोकधारणा में मिलती है।

गीत में पार्वती के तप, विरह और प्रतीक्षा को जिस तरह से व्यक्त किया गया है, वह इसे सामान्य धार्मिक गीत से अलग बनाता है। इसे सुनते हुए श्रोता को भक्ति के साथ करुणा और भावनात्मक जुड़ाव भी महसूस होता है।

नचारी और महेशवाणी की खास परंपरा

मिथिला की नचारी और महेशवाणी लोकगीत परंपरा में भगवान शिव के व्यक्तित्व को लोकजीवन के बेहद करीब लाकर प्रस्तुत किया जाता है। यहां शिव केवल देवता नहीं, बल्कि लोकभावना से जुड़े पात्र के रूप में भी दिखाई देते हैं।

‘फिरे शिव के करनमा गौरी वन में वन में ना…’ इसी परंपरा की भावपूर्ण अभिव्यक्ति मानी जाती है। गीत में पार्वती का समर्पण, तपस्या और शिव के प्रति उनकी अटूट आस्था दिखाई देती है।

मिथिलांचल में ऐसे लोकगीत धार्मिक आस्था के साथ-साथ क्षेत्र की सांस्कृतिक विरासत को भी जीवित रखते हैं। पीढ़ियों से चली आ रही मौखिक परंपरा के कारण इन गीतों में लोकभाषा, भावनाएं और धार्मिक कथाएं एक साथ दिखाई देती हैं।

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