इंफ्रास्ट्रक्चर और रियल एस्टेट क्षेत्र की बड़ी कंपनी Jaiprakash Associates Limited (JAL) के दिवालिया समाधान में बड़ा फैसला सामने आया है। Adani Group ने ₹14,535 करोड़ की बोली लगाकर कंपनी को खरीदने की दौड़ जीत ली है। हालांकि, इस सौदे ने बैंकिंग और वित्तीय जगत में चिंता भी बढ़ा दी है, क्योंकि कंपनी पर कुल ₹55,357 करोड़ का कर्ज है।
इस सौदे के चलते कर्जदाताओं—यानी बैंकों और वित्तीय संस्थानों—को करीब ₹40,822 करोड़ का नुकसान उठाना पड़ेगा। वित्तीय भाषा में इसे ‘हेयरकट’ कहा जाता है, जो इस मामले में काफी बड़ा माना जा रहा है।
दिवालिया प्रक्रिया के तहत यह डील Insolvency and Bankruptcy Code (IBC) के नियमों के अनुसार हो रही है। IBC का उद्देश्य यह होता है कि संकट में फंसी कंपनियों को जल्दी से पुनर्जीवित किया जाए, भले ही इसके लिए कर्जदाताओं को कुछ हिस्सा छोड़ना पड़े।
जानकारी के मुताबिक, JAL ने करीब 19 बैंकों और वित्तीय संस्थानों से भारी कर्ज लिया था। अब जब कंपनी अदाणी समूह के हाथों बिक रही है, तो इन लेंडर्स को अपने बड़े हिस्से का पैसा छोड़ना होगा।
इस सौदे में एक दिलचस्प पहलू यह भी रहा कि Vedanta Limited ने सबसे ऊंची—करीब ₹17,000 करोड़—की बोली लगाई थी। लेकिन उसका भुगतान प्लान लंबी अवधि, लगभग 5 वर्षों में फैला हुआ था। इसके मुकाबले अदाणी समूह ने महज 2 वर्षों में भुगतान पूरा करने का प्रस्ताव दिया, जो लेंडर्स को अधिक व्यावहारिक और सुरक्षित लगा।
विशेषज्ञों का मानना है कि इस तरह के बड़े ‘हेयरकट’ भारतीय बैंकिंग प्रणाली के लिए चिंता का विषय हैं, क्योंकि इससे बैंकों की बैलेंस शीट पर दबाव बढ़ता है। हालांकि, दूसरी ओर यह भी तर्क दिया जा रहा है कि अगर कंपनी को पूरी तरह बंद होने दिया जाता, तो नुकसान और भी अधिक हो सकता था।
अब इस सौदे के पूरा होने के बाद Gautam Adani के नेतृत्व वाला अदाणी समूह JAL का मालिक बन जाएगा। यह अधिग्रहण समूह के इंफ्रास्ट्रक्चर पोर्टफोलियो को और मजबूत कर सकता है।
फिलहाल, बाजार और निवेशकों की नजर इस बात पर टिकी है कि अदाणी समूह इस संकटग्रस्त कंपनी को कितनी जल्दी और प्रभावी तरीके से पुनर्जीवित कर पाता है, और क्या भविष्य में इस तरह के बड़े हेयरकट से बचने के लिए बैंकिंग व्यवस्था में कोई सुधार किए जाएंगे।











